JAGTIV · Previous Year Questions

UPPSC

ENVIRONMENT · 2025

Previous Year Question

‘दिल्ली सरकार के बायो-डीकंपोजर एवं स्प्रे कार्यक्रम’ के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

  1. पराली को खाद में बदलने में मदद के लिए किसानों को बायो-डीकंपोजर घोल मुफ्त में उपलब्ध कराया जाता है।

  2. बायो-डीकंपोजर घोल कई कवकों का उपयोग करके तैयार किया जाता है।

नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए:

A.

केवल 2

B.

न तो 1 न ही 2

C.

1 और 2 दोनों

D.

केवल 1

Correct Answer: C

Detailed Solution

कथन 1 सही है। दिल्ली सरकार का बायो-डीकंपोजर एवं स्प्रे कार्यक्रम (Bio-Decomposer and Spray Programme) पराली जलाने (Stubble Burning) से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने के लिए शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम के अंतर्गत किसानों के खेतों में बायो-डीकंपोजर घोल का निःशुल्क छिड़काव किया जाता है, जिससे धान की कटाई के बाद बची पराली खेत में ही विघटित होकर जैविक खाद (Organic Manure) में परिवर्तित हो सके। नीति आयोग (NITI Aayog) के अनुसार, इस कार्यक्रम का उद्देश्य पराली प्रबंधन को अधिक सुलभ बनाना, कृषि अवशेषों को जलाने की आवश्यकता कम करना और मृदा की उर्वरता (Soil Fertility) में सुधार करना है। इस कार्यक्रम का संचालन दिल्ली सरकार के विकास विभाग की कृषि इकाई द्वारा किया गया।

कथन 2 भी सही है। बायो-डीकंपोजर घोल भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (Indian Agricultural Research Institute—ICAR-IARI), पूसा, नई दिल्ली द्वारा विकसित पूसा डीकंपोजर (Pusa Decomposer) तकनीक पर आधारित है। यह सात प्रकार के कवकों (Fungi) का सूक्ष्मजीवी समूह (Microbial Consortium) है। इनमें Aspergillus awamori, Phlebia radiata, Aspergillus nidulans, Aspergillus clavatus, Aspergillus flavus, Trichoderma viride और Aspergillus fumigatus शामिल हैं। ये कवक ऐसे एंजाइम (Enzymes) उत्पन्न करते हैं, जो कृषि अवशेषों में उपस्थित सेल्यूलोज (Cellulose), लिग्निन (Lignin) और पेक्टिन (Pectin) जैसे जटिल कार्बनिक पदार्थों के अपघटन में सहायता करते हैं।

बायो-डीकंपोजर की कार्यविधि (Working Mechanism) में सूक्ष्मजीवी मिश्रण को उपयुक्त माध्यम में संवर्धित करके तरल घोल तैयार किया जाता है। नीति आयोग की वर्ष 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, डीकंपोजर कैप्सूल से तैयार मिश्रण को लगभग 8–10 दिनों तक किण्वित (Fermentation) किया जाता है। इसके बाद तैयार घोल का खेतों में मौजूद पराली पर छिड़काव किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, अनुकूल परिस्थितियों में यह सूक्ष्मजीवी घोल लगभग 15–20 दिनों में पराली को खाद में परिवर्तित करने में सहायता कर सकता है। अपघटन की वास्तविक गति नमी, तापमान, पराली की प्रकृति और खेत की परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

इस कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य पराली का खेत में ही प्रबंधन (In-situ Crop Residue Management) करना है। पराली जलाने से वायुमंडल में सूक्ष्म कण (Particulate Matter—PM), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ) तथा अन्य प्रदूषक उत्सर्जित होते हैं। जैविक अपघटन द्वारा पराली को मिट्टी में मिलाने से मृदा कार्बनिक कार्बन (Soil Organic Carbon) और पोषक तत्त्वों के पुनर्चक्रण (Nutrient Recycling) में सहायता मिल सकती है। यह तकनीक पराली जलाने का जैविक विकल्प प्रदान करती है तथा टिकाऊ कृषि (Sustainable Agriculture) और वायु प्रदूषण नियंत्रण में योगदान देती है।

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