Previous Year Question
भारत में गिद्धों की कमी का अत्यधिक प्रमुख कारण है-
विषाणु संक्रमण
जीवाणु संक्रमण
जानवरों को दर्द निवारक देना
जानवरों को एस्ट्रोजन इन्जेक्शन देना
Correct Answer: C
Detailed Solution
भारत में गिद्धों (Vultures) की संख्या में अत्यधिक गिरावट का प्रमुख कारण पशुओं को दी जाने वाली दर्द निवारक दवा डाइक्लोफेनाक (Diclofenac) का व्यापक उपयोग रहा है। यह एक गैर-स्टेरॉयडल सूजनरोधी औषधि (Non-Steroidal Anti-Inflammatory Drug—NSAID) है, जिसका उपयोग पशुओं में दर्द, सूजन और बुखार कम करने के लिए किया जाता था। जब डाइक्लोफेनाक से उपचारित गाय, भैंस या अन्य पशुओं की मृत्यु हो जाती है, तो उनके शरीर के ऊतकों में दवा के अवशेष मौजूद रह सकते हैं। गिद्ध इन मृत पशुओं के शवों (Carcasses) को खाते समय दवा के अवशेष ग्रहण कर लेते हैं, जिससे उनके शरीर में गंभीर विषाक्तता उत्पन्न हो सकती है।
डाइक्लोफेनाक गिद्धों के गुर्दों (Kidneys) को गंभीर क्षति पहुँचाती है, जिसके परिणामस्वरूप तीव्र गुर्दा विफलता (Acute Kidney Failure) हो सकती है। गुर्दों की कार्यक्षमता प्रभावित होने से यूरिक अम्ल (Uric Acid) का सामान्य उत्सर्जन बाधित हो जाता है और इसके क्रिस्टल आंतरिक अंगों पर जमा होने लगते हैं। इस स्थिति को आंतरांग गाउट (Visceral Gout) कहा जाता है। अत्यधिक संवेदनशील गिद्धों में डाइक्लोफेनाक युक्त शव का सेवन करने के कुछ दिनों के भीतर मृत्यु हो सकती है। शोध में पाया गया है कि पशुओं के शवों में डाइक्लोफेनाक के अपेक्षाकृत कम स्तर भी गिद्धों की आबादी के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकते हैं।
भारत में 1990 के दशक से गिद्धों की आबादी में असाधारण गिरावट दर्ज की गई। विशेष रूप से सफेद पीठ वाला गिद्ध (White-rumped Vulture—Gyps bengalensis), भारतीय गिद्ध (Indian Vulture—Gyps indicus) और पतली चोंच वाला गिद्ध (Slender-billed Vulture—Gyps tenuirostris) गंभीर रूप से प्रभावित हुए। विभिन्न वैज्ञानिक सर्वेक्षणों में इन प्रजातियों की आबादी में 90 प्रतिशत से अधिक और कुछ मामलों में लगभग 99 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई। ये तीनों प्रजातियाँ IUCN की गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered—CR) श्रेणी में शामिल हैं। गिद्ध प्राकृतिक अपमार्जक (Scavengers) हैं, जो मृत पशुओं के शवों का शीघ्र निपटान करके पारिस्थितिक स्वच्छता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
गिद्ध संरक्षण के लिए भारत सरकार ने 2006 में पशु चिकित्सा में डाइक्लोफेनाक के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया शुरू की, जिसे 2008 की अधिसूचना द्वारा वैधानिक रूप दिया गया। इसके अतिरिक्त 2015 में मानव उपयोग वाली डाइक्लोफेनाक की बहुखुराक शीशियों (Multi-dose Vials) पर प्रतिबंध लगाकर उनके पशुओं में दुरुपयोग को रोकने का प्रयास किया गया। पशु चिकित्सा में गिद्धों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प के रूप में मेलॉक्सिकैम (Meloxicam) तथा टॉलफेनैमिक अम्ल (Tolfenamic Acid) की पहचान की गई है। भारत में गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र (Vulture Conservation Breeding Centres), सुरक्षित आवास क्षेत्रों और दवा निगरानी कार्यक्रमों के माध्यम से प्रभावित प्रजातियों की आबादी पुनर्स्थापित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।