Previous Year Question
झूमिंग करते हैं :
भोटिया
खासी
संथाल
टोडा
Correct Answer: B
Detailed Solution
झूमिंग (Jhumming) अथवा झूम कृषि (Jhum Cultivation) एक प्रकार की स्थानांतरित कृषि (Shifting Cultivation) है, जिसका प्रचलन भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में रहा है। खासी (Khasi) जनजाति, जो मुख्यतः मेघालय की खासी पहाड़ियों (Khasi Hills) में निवास करती है, पारंपरिक रूप से झूम कृषि से जुड़ी रही है। यह कृषि पद्धति विशेष रूप से पहाड़ी और वन क्षेत्रों में अपनाई जाती है।
झूम कृषि को कर्तन एवं दहन कृषि (Slash-and-Burn Cultivation) भी कहा जाता है। इसमें वनस्पतियों और झाड़ियों को काटकर सुखाया जाता है तथा बाद में जलाकर भूमि को खेती के लिए तैयार किया जाता है। जली हुई वनस्पतियों की राख मिट्टी में पोटैशियम सहित कुछ खनिज पोषक तत्त्व उपलब्ध कराती है। तैयार भूमि पर धान, मक्का, बाजरा और विभिन्न सब्जियों जैसी फसलें उगाई जाती हैं।
इस कृषि पद्धति में भूमि पर सामान्यतः कुछ समय तक खेती करने के बाद उसे परती (Fallow) छोड़ दिया जाता है, ताकि प्राकृतिक वनस्पति और मिट्टी की उर्वरता पुनः विकसित हो सके। इसके बाद किसान किसी दूसरे भूखंड पर खेती करते हैं। पर्याप्त परती अवधि मिलने पर भूमि की पुनर्प्राप्ति संभव होती है, लेकिन झूम चक्र (Jhum Cycle) छोटा होने से मृदा अपरदन (Soil Erosion), पोषक तत्त्वों की कमी तथा वनस्पति आवरण के क्षरण जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं।
भारत में झूम कृषि का संबंध केवल खासी जनजाति से नहीं है; गारो, नागा, मिजो और उत्तर-पूर्व की अन्य जनजातियों में भी इसके विभिन्न रूप प्रचलित रहे हैं। विकल्पों में भोटिया मुख्यतः हिमालयी क्षेत्र, संथाल पूर्वी भारत तथा टोडा तमिलनाडु की नीलगिरि पहाड़ियों से संबंधित हैं। टोडा जनजाति विशेष रूप से भैंस पालन के लिए जानी जाती है। इस प्रकार दिए गए विकल्पों में खासी जनजाति झूम कृषि से संबंधित है।