Previous Year Question
भारत के उपराष्ट्रपति के निर्वाचन के संदर्भ में, जिसे भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा शून्य घोषित कर दिया गया हो, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
ऐसी घोषणा से पूर्व उपराष्ट्रपति द्वारा किए गए कार्य वैध माने जाते हैं।
ऐसी घोषणा के दिन उपराष्ट्रपति द्वारा किए गए कार्य वैध नहीं माने जाते हैं।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :
कूट :
न तो 1 और न ही 2
केवल 1
केवल 2
1 और 2 दोनों
Correct Answer: B
Detailed Solution
संविधान का अनुच्छेद 71 राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित विवादों का प्रावधान करता है। अनुच्छेद 71(1) के अनुसार राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से उत्पन्न सभी संदेह और विवादों की जाँच और निर्णय उच्चतम न्यायालय करता है और उसका निर्णय अंतिम होता है।
कथन 1 सही है। अनुच्छेद 71(2) के अनुसार यदि उच्चतम न्यायालय किसी व्यक्ति का राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचन शून्य घोषित कर देता है, तो निर्णय की तारीख तक उसके द्वारा उस पद की शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग में किए गए कार्य केवल उस घोषणा के कारण अमान्य नहीं होंगे।
अर्थात उपराष्ट्रपति ने न्यायालय के निर्णय से पहले अपने पद की शक्तियों का प्रयोग करते हुए जो आधिकारिक कार्य किए, वे केवल बाद में निर्वाचन शून्य घोषित हो जाने के कारण invalid नहीं हो जाते।
कथन 2 गलत है, क्योंकि संविधान में केवल निर्णय से पहले किए गए कार्यों को ही संरक्षण नहीं दिया गया है। अनुच्छेद 71(2) में स्पष्ट शब्द हैं—“on or before the date of the decision”, अर्थात उच्चतम न्यायालय के निर्णय की तारीख को और उससे पहले किए गए कार्यों को संरक्षण प्राप्त है।
इसलिए यदि निर्वाचन जिस दिन शून्य घोषित किया जाता है, उसी दिन निर्णय से संबंधित संवैधानिक अर्थ में उपराष्ट्रपति द्वारा किए गए आधिकारिक कार्य हैं, तो उन्हें केवल उस declaration के कारण invalid नहीं माना जाएगा। इसी कारण कथन 2 गलत है।
एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अनुच्छेद 71(4) के अनुसार राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति का निर्वाचन केवल इस आधार पर चुनौती नहीं दिया जा सकता कि Electoral College में किसी कारण से कोई vacancy मौजूद थी।