JAGTIV · Previous Year Questions

UPPSC

POLITY · 2024

Previous Year Question

निम्नलिखित के सही कालानुक्रम की पहचान कीजिए :

  1. शंकरी प्रसाद बनाम भारतीय संघ

  2. सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य

  3. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य

  4. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य

नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर चुनिए :

A.

1, 4, 3, 2

B.

3, 2, 1, 4

C.

1, 2, 3, 4

D.

3, 4, 2, 1

Correct Answer: C

Detailed Solution

1. शंकरी प्रसाद बनाम भारतीय संघ — 1951

इस मामले में प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।

मुख्य प्रश्न यह था कि क्या संसद संविधान संशोधन के माध्यम से मौलिक अधिकारों में परिवर्तन कर सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 368 के अंतर्गत किए गए संविधान संशोधन को अनुच्छेद 13(2) के अर्थ में साधारण विधि नहीं माना जाएगा।

इसलिए संसद संविधान संशोधन द्वारा मौलिक अधिकारों में भी संशोधन कर सकती थी।

यह संविधान की संशोधन शक्ति से संबंधित प्रारंभिक महत्वपूर्ण निर्णय था।

2. सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य — 1965

इस मामले में 17वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1964 की वैधता को चुनौती दी गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने शंकरी प्रसाद मामले में निर्धारित सिद्धांत का अनुसरण करते हुए संविधान संशोधन की शक्ति के अंतर्गत मौलिक अधिकारों में संशोधन की संसद की शक्ति को स्वीकार किया।

इस निर्णय में संविधान संशोधन की शक्ति की सीमाओं से संबंधित प्रश्न भी सामने आए।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि इस मामले का निर्णय 30 अक्टूबर 1964 को दिया गया था, जबकि इसे सामान्यतः AIR 1965 SC 845 के रूप में उद्धृत किया जाता है।

इसलिए परीक्षा के कालक्रम में इसे प्रायः 1965 के मामले के रूप में पढ़ाया जाता है।

3. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य — 1967

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 11 न्यायाधीशों वाली पीठ ने 6:5 के बहुमत से निर्णय दिया।

न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती दृष्टिकोण से अलग निर्णय देते हुए कहा कि संसद संविधान संशोधन द्वारा मौलिक अधिकारों को समाप्त या सीमित नहीं कर सकती।

इस निर्णय में अनुच्छेद 13(2) के अंतर्गत संविधान संशोधन की स्थिति और संसद की संशोधन शक्ति की सीमाओं पर विचार किया गया।

न्यायालय ने भावी प्रभाव के सिद्धांत (Prospective Overruling) का भी प्रयोग किया, जिसके कारण पहले किए गए संविधान संशोधनों की वैधता बनी रही।

4. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य — 1973

इस मामले का निर्णय 24 अप्रैल 1973 को सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने दिया।

न्यायालय ने 7:6 के बहुमत से संविधान की मूल संरचना का सिद्धांत प्रतिपादित किया।

इस सिद्धांत के अनुसार संसद अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट या क्षतिग्रस्त नहीं कर सकती।

इस निर्णय ने गोलकनाथ मामले में निर्धारित मौलिक अधिकारों के संशोधन पर पूर्ण प्रतिबंध को स्वीकार नहीं किया और संविधान संशोधन की शक्ति पर मूल संरचना की सीमा निर्धारित की।

इस प्रकार चारों मामलों से संविधान संशोधन की शक्ति की न्यायिक व्याख्या का विकास स्पष्ट होता है।

सही कालानुक्रम:

शंकरी प्रसाद (1951) → सज्जन सिंह (1965) → गोलकनाथ (1967) → केशवानंद भारती (1973)

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