JAGTIV · Previous Year Questions

UPPSC

POLITY · 2023

Previous Year Question

निम्नलिखित में से कौन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 का हिस्सा नहीं है?

A.

यातना के विरुद्ध निषेध

B.

स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी होने से निषेध

C.

कार्योत्तर विधि

D.

दोहरे दण्ड की धारा

Correct Answer: A

Detailed Solution

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20 अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण प्रदान करता है। इसके अंतर्गत तीन प्रमुख संवैधानिक संरक्षण दिए गए हैं।

(a) यातना के विरुद्ध निषेध

यातना के विरुद्ध निषेध को अनुच्छेद 20 में पृथक रूप से शामिल नहीं किया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की व्याख्या करते हुए हिरासत में यातना तथा अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार को असंवैधानिक माना है।

डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने हिरासत में यातना और हिंसा की रोकथाम के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश दिए थे।

(b) स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी होने से निषेध — अनुच्छेद 20(3)

अनुच्छेद 20(3) के अनुसार किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

इसे आत्म-अभिशंसन के विरुद्ध संरक्षण (Protection against Self-incrimination) कहा जाता है।

इसका उद्देश्य आरोपी व्यक्ति को अपने विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य किए जाने से संरक्षण प्रदान करना है।

(c) कार्योत्तर विधि — अनुच्छेद 20(1)

अनुच्छेद 20(1) के अनुसार किसी व्यक्ति को ऐसे कार्य के लिए अपराध का दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जो उस कार्य के किए जाने के समय लागू कानून के अंतर्गत अपराध नहीं था।

इसके अतिरिक्त अपराध किए जाने के समय लागू कानून में निर्धारित दण्ड से अधिक दण्ड भी नहीं दिया जा सकता।

अर्थात् बाद में बनाए गए किसी आपराधिक कानून को पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू करके किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

(d) दोहरे दण्ड की धारा — अनुच्छेद 20(2)

अनुच्छेद 20(2) के अनुसार किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दण्डित नहीं किया जा सकता।

इसे दोहरे दण्ड के विरुद्ध संरक्षण (Double Jeopardy) कहा जाता है।

इस संवैधानिक संरक्षण के लिए एक ही अपराध के संबंध में अभियोजन और दण्ड, दोनों की शर्त महत्वपूर्ण है।

इस प्रकार अनुच्छेद 20 में कार्योत्तर आपराधिक विधि, दोहरे दण्ड और आत्म-अभिशंसन के विरुद्ध संरक्षण शामिल हैं। यातना के विरुद्ध संरक्षण मुख्यतः अनुच्छेद 21 की न्यायिक व्याख्या से संबंधित है।

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