Previous Year Question
'संविधान की मूल संरचना' की अवधारणा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किस वाद में प्रतिपादित की गई थी?
युसुफ बनाम बम्बई राज्य – 1954 में
गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य – 1967 में
चित्रलेखा बनाम मैसूर राज्य – 1964 में
केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य – 1973 में
Correct Answer: D
Detailed Solution
केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य (1973) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान की मूल संरचना का सिद्धांत प्रतिपादित किया था।
इस ऐतिहासिक मामले का निर्णय 24 अप्रैल 1973 को सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने 7:6 के बहुमत से दिया था।
मूल संरचना सिद्धांत का अर्थ
अनुच्छेद 368 संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति प्रदान करता है। लेकिन केशवानन्द भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्धारित किया कि संसद अपनी संशोधन शक्ति का प्रयोग करके संविधान की मूल संरचना को नष्ट या क्षतिग्रस्त नहीं कर सकती।
इसका अर्थ है कि संविधान के प्रावधानों में संशोधन किया जा सकता है, लेकिन संशोधन के माध्यम से संविधान की मूल पहचान समाप्त नहीं की जा सकती।
मूल संरचना में शामिल प्रमुख तत्व
सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों में संविधान की सर्वोच्चता, न्यायिक पुनरावलोकन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संघीय व्यवस्था और शक्तियों के पृथक्करण जैसे सिद्धांतों को मूल संरचना से संबंधित माना गया है।
मूल संरचना के सभी तत्वों की कोई निश्चित और संपूर्ण सूची संविधान में नहीं दी गई है। यह सिद्धांत न्यायिक व्याख्या के माध्यम से विकसित हुआ है।
गोलकनाथ मामले से अंतर
गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) में सर्वोच्च न्यायालय ने संसद की संशोधन शक्ति को सीमित करते हुए मौलिक अधिकारों में संशोधन पर रोक लगाई थी।
लेकिन केशवानन्द भारती मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के प्रावधानों में संशोधन कर सकती है, बशर्ते संशोधन से संविधान की मूल संरचना को क्षति न पहुँचे।
इस प्रकार गोलकनाथ मामला संविधान संशोधन की शक्ति से संबंधित था, जबकि मूल संरचना सिद्धांत के प्रतिपादन का श्रेय केशवानन्द भारती मामले को दिया जाता है।