JAGTIV · Previous Year Questions

UPPSC

POLITY · 2012

Previous Year Question

निम्नलिखित में से किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने धारणा व्यक्त की कि “मूल अधिकार व्यक्ति को जैसा उसे सबसे अच्छा लगे उस तरह अपनी जिन्दगी की रूपरेखा तैयार करने के लिए सक्षम बनाते हैं” ?

A.

इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण

B.

गोलक नाथ बनाम स्टेट ऑफ पंजाब

C.

बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मामला

D.

अज़हर बनाम म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन

Correct Answer: B

Detailed Solution

यह कथन I. C. Golak Nath v. State of Punjab (1967) के निर्णय से संबंधित है। इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने Fundamental Rights को मानव व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक primordial/natural rights के रूप में रेखांकित करते हुए कहा कि ये व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार अपने जीवन की रूपरेखा तय करने में सक्षम बनाते हैं।

गोलकनाथ वाद 11 न्यायाधीशों की पीठ द्वारा तय किया गया था। बहुमत का तत्कालीन निष्कर्ष यह था कि संसद संविधान संशोधन के माध्यम से भी Part III के Fundamental Rights को छीन या सीमित नहीं कर सकती। इस निर्णय ने संसद की amendment power पर उस समय एक महत्वपूर्ण सीमा स्थापित की।

इस मामले में prospective overruling का सिद्धांत भी महत्वपूर्ण रहा। इसका व्यावहारिक अर्थ यह था कि पूर्व में किए गए संविधान संशोधनों को तत्काल अमान्य करके व्यवस्था को उलटने के बजाय निर्णय को भविष्य के लिए लागू किया गया।

इसके बाद संवैधानिक स्थिति बदली। 24वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 ने स्पष्ट किया कि संसद Article 368 के अंतर्गत अपनी constituent power से संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन कर सकती है और Article 13 को ऐसे constitutional amendments पर लागू नहीं माना जाएगा।

फिर Kesavananda Bharati v. State of Kerala (1973) में Supreme Court ने माना कि संसद की amendment power व्यापक है, लेकिन वह संविधान की Basic Structure को नष्ट या परिवर्तित नहीं कर सकती। इसलिए आज Golak Nath का amendment-power वाला निष्कर्ष अकेले वर्तमान संवैधानिक स्थिति नहीं बताता; लेकिन इस प्रश्न में दिया गया Fundamental Rights संबंधी कथन Golak Nath case से ही है।

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