Previous Year Question
नीचे दो कथन दिए गए हैं। एक को कथन (A) तथा दूसरे को कारण (R) कहा गया है।
कथन (A) : मध्यकाल में संगीत पर संस्कृत में लिखी गई अनेक पुस्तकों का फारसी में अनुवाद किया गया।
कारण (R) : आरंभिक चिश्ती सूफी संत संगीत सभाओं, जिन्हें ‘समा’ कहा जाता था, के शौकीन थे।
नीचे दिए कूटों में से सही उत्तर का चयन कीजिए।
कथन (A) तथा कारण (R) दोनों सही हैं तथा कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या है।
कथन (A) तथा कारण (R) दोनों सही हैं किन्तु कारण (R) कथन (A) की व्याख्या नहीं है।
कथन (A) सही है, किंतु कारण (R) गलत है।
कथन (A) गलत है, किंतु कारण (R) सही है।
Correct Answer: A
Detailed Solution
मध्यकालीन भारत में संस्कृत और फारसी बौद्धिक परंपराओं के बीच व्यापक संपर्क विकसित हुआ। धार्मिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक तथा संगीत से संबंधित भारतीय ग्रंथों और ज्ञान-परंपराओं का फारसी में अनुवाद या रूपांतरण किया गया।
संगीत के क्षेत्र में इसका एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण मानकुतूहल (Manakutuhala) है। ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर के संरक्षण में तैयार संगीत संबंधी इस ग्रंथ की सामग्री बाद में फारसी में संरक्षित हुई। 17वीं शताब्दी में फकीरुल्लाह द्वारा तैयार Tarjuma-i-Manakutuhala तथा Risala-i-Ragadarpana भारतीय संगीत और फारसी विद्वत् परंपरा के इस संपर्क का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
कारण (R) भी सही है। चिश्ती सूफी परंपरा में संगीत को आध्यात्मिक अनुभव के साधन के रूप में महत्त्व मिला। सूफियों की संगीत-प्रधान आध्यात्मिक सभा को समा (sama) कहा जाता था।
विशेष रूप से चिश्ती परंपरा में ऐसी संगीत सभाएँ लोकप्रिय थीं। इनमें काव्य और संगीत के माध्यम से ईश्वर के प्रति प्रेम और आध्यात्मिक निकटता की अनुभूति का प्रयास किया जाता था। आगे चलकर इसी सांस्कृतिक वातावरण में qawwali जैसी संगीत परंपराओं का भी विकास हुआ।
लेकिन संस्कृत संगीत ग्रंथों का फारसी में अनुवाद इसलिए नहीं हुआ कि आरंभिक चिश्ती सूफी समा के शौकीन थे। ग्रंथों का अनुवाद व्यापक Indo-Persian cultural and intellectual interaction, राजकीय संरक्षण तथा ज्ञान के आदान-प्रदान की प्रक्रिया का भाग था, जबकि समा चिश्ती सूफियों की आध्यात्मिक-संगीत परंपरा थी।