JAGTIV · Previous Year Questions

UPPSC

HISTORY · 2014

Previous Year Question

‘दस्तार-बंदान’ किसे कहा जाता था?

A.

सूफी संत

B.

खान

C.

मलिक

D.

उलेमा

Correct Answer: D

Detailed Solution

दिल्ली सल्तनत के सामाजिक और प्रशासनिक ढाँचे में उलेमा उन मुस्लिम विद्वानों का वर्ग था जिन्हें इस्लामी धर्मशास्त्र, शरीअत और धार्मिक कानून का विशेष ज्ञान होता था।

सल्तनत काल में उच्च धार्मिक और न्यायिक पदों से जुड़े इन विद्वानों को सामूहिक रूप से ‘दस्तार-बंदान’ कहा जाता था।

‘दस्तार’ का अर्थ पगड़ी होता है और ‘दस्तार-बंदान’ का आशय पगड़ी बाँधने वाले प्रतिष्ठित विद्वानों से था। विशेष प्रकार की पगड़ी उनके धार्मिक-विद्वतापूर्ण पद और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक थी।

उलेमा का प्रभाव केवल धार्मिक मामलों तक सीमित नहीं था। उनमें से कई काज़ी, मुफ्ती, सद्र तथा धार्मिक कानून से जुड़े अन्य पदों पर कार्य करते थे।

काज़ी न्यायिक मामलों में शरीअत के आधार पर निर्णय देता था, जबकि मुफ्ती धार्मिक-कानूनी प्रश्नों पर मत अथवा फतवा देता था। उच्च स्तर के धार्मिक अधिकारियों का सल्तनत की शासन-व्यवस्था पर भी प्रभाव हो सकता था।

हालाँकि सभी उलेमा सीधे राज्य कर्मचारी नहीं थे। यह व्यापक धार्मिक-विद्वतापूर्ण वर्ग था, जिसमें राज्य से जुड़े और स्वतंत्र दोनों प्रकार के विद्वान शामिल हो सकते थे।

सूफी संत मुख्यतः रहस्यवादी आध्यात्मिक परंपरा से जुड़े थे, जबकि खान और मलिक सामान्यतः राजनीतिक अथवा सैन्य अभिजात वर्ग से संबंधित उपाधियाँ थीं। इसलिए इनमें से ‘दस्तार-बंदान’ शब्द विशेष रूप से उलेमा के लिए प्रयुक्त होता था।

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