JAGTIV · Previous Year Questions

UPSC

ECONOMY · 2019

Previous Year Question

यदि निकट भविष्य में एक और वैश्विक वित्तीय संकट होता है, तो निम्नलिखित में से कौन-सी कार्रवाई/नीतियाँ भारत को कुछ उन्मुक्ति प्रदान करने की सर्वाधिक संभावना रखती हैं?

  1. अल्पकालीन विदेशी उधारों पर निर्भर न रहना

  2. अधिक विदेशी बैंकों को खोलना

  3. पूर्ण पूँजी खाता परिवर्तनीयता बनाए रखना

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

A.

केवल 1

B.

केवल 1 और 2

C.

केवल 3

D.

1, 2 और 3

Correct Answer: A

Detailed Solution

कथन 1 सही है। अल्पकालीन विदेशी उधार पर कम निर्भरता किसी वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान अर्थव्यवस्था की vulnerability घटाती है।

Short-term external borrowing में सामान्यतः निम्नलिखित जोखिम होते हैं:

  • Rollover risk: ऋण की परिपक्वता पर विदेशी lender नया ऋण देने से मना कर सकता है।

  • Sudden-stop risk: वैश्विक अनिश्चितता बढ़ते ही विदेशी पूँजी का प्रवाह अचानक रुक सकता है।

  • Currency risk: घरेलू मुद्रा के depreciation से विदेशी मुद्रा में लिए गए ऋण का घरेलू मुद्रा मूल्य बढ़ जाता है।

  • Liquidity risk: कम समय में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा उपलब्ध करानी पड़ सकती है।

यदि किसी भारतीय borrower ने डॉलर में ऋण लिया है और रुपये का मूल्य गिरता है, तो समान डॉलर principal तथा interest चुकाने के लिए अधिक रुपये की आवश्यकता होगी। पर्याप्त foreign-exchange reserves होने के बावजूद बड़ी short-term liabilities संकट को गंभीर बना सकती हैं।

इसलिए low short-term external debt, long maturity profile और पर्याप्त foreign-exchange reserves अर्थव्यवस्था को अपेक्षाकृत अधिक resilience प्रदान करते हैं।

कथन 2 गलत है। अधिक विदेशी बैंकों का प्रवेश अपने आप किसी देश को वैश्विक वित्तीय संकट से सुरक्षा नहीं देता। Foreign banks वित्त, technology और competition ला सकते हैं, लेकिन संकट के दौरान वे:

  • अपनी parent company को liquidity भेज सकते हैं;

  • घरेलू lending घटा सकते हैं;

  • risky assets बेच सकते हैं; अथवा

  • संकट को एक देश से दूसरे देश तक प्रसारित कर सकते हैं।

इसे cross-border transmission अथवा financial contagion कहा जाता है। इसलिए केवल foreign banks की संख्या बढ़ाना संकट से उन्मुक्ति की नीति नहीं है।

कथन 3 गलत है। Full Capital Account Convertibility का अर्थ है कि residents और non-residents financial assets खरीदने, बेचने तथा पूँजी को देश के भीतर या बाहर स्थानांतरित करने के लिए घरेलू मुद्रा को विदेशी मुद्रा में अपेक्षाकृत स्वतंत्र रूप से बदल सकें।

संकट के समय पूर्ण परिवर्तनीयता:

  • बड़े capital outflows;

  • exchange-rate depreciation;

  • विदेशी मुद्रा reserves पर दबाव; और

  • asset-price volatility

को बढ़ा सकती है। इसलिए मजबूत banking regulation, deep financial markets और macroeconomic stability के बिना पूर्ण capital-account convertibility सुरक्षा देने के बजाय जोखिम बढ़ा सकती है।

भारत ने 1994 में IMF Article VIII के दायित्व स्वीकार करते हुए current-account convertibility अपनाई थी, लेकिन capital account पर calibrated restrictions बनाए रखे। भारत की व्यवस्था पूर्ण capital-account convertibility के स्थान पर क्रमिक और सावधानीपूर्ण liberalisation पर आधारित रही है।

अतः दिए गए विकल्पों में केवल अल्पकालीन विदेशी उधारों पर निर्भर न रहना भारत को वैश्विक वित्तीय संकट से कुछ सुरक्षा प्रदान कर सकता है।

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