Previous Year Question
गांधीवाद और मार्क्सवाद के बीच एक समान सहमति है:
राज्यविहीन समाज का अंतिम लक्ष्य
वर्ग संघर्ष
निजी संपत्ति की समाप्ति
आर्थिक नियतिवाद
Correct Answer: A
Detailed Solution
गांधीवाद और मार्क्सवाद की दार्शनिक पद्धतियों तथा परिवर्तन के साधनों में मूलभूत अंतर है। फिर भी दोनों विचारधाराओं में एक समानता यह है कि उनकी आदर्श सामाजिक व्यवस्था में दमनकारी राज्य की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। इसलिए राज्यविहीन समाज को अंतिम लक्ष्य मानना दोनों के बीच समान बिंदु है।
मार्क्सवादी दृष्टिकोण में राज्य वर्गीय प्रभुत्व का साधन है। पूँजीवादी समाज में राज्य शासक पूँजीपति वर्ग के हितों की रक्षा करता है। वर्गविहीन साम्यवादी समाज स्थापित होने के बाद वर्ग-संघर्ष और वर्गीय दमन समाप्त हो जाएंगे तथा राज्य क्रमशः अनावश्यक होकर विलुप्त हो जाएगा। इसे राज्य का क्रमशः लोप या withering away of the State कहा जाता है।
गांधीजी अत्यधिक केंद्रीकृत और हिंसात्मक राज्य-सत्ता के आलोचक थे। उनकी आदर्श व्यवस्था स्वशासी, आत्म-अनुशासित और विकेंद्रीकृत ग्राम समुदायों पर आधारित थी। ऐसी व्यवस्था में व्यक्ति बाहरी दंडात्मक सत्ता के बजाय नैतिक आत्म-अनुशासन से संचालित होगा और राज्य का हस्तक्षेप न्यूनतम हो जाएगा। इस आदर्श स्थिति को कभी-कभी प्रबुद्ध अराजकता से संबंधित किया जाता है।
अन्य विकल्प दोनों विचारधाराओं के समान तत्व नहीं हैं:
वर्ग संघर्ष मार्क्सवादी परिवर्तन का प्रमुख आधार है, जबकि गांधीजी वर्ग-सहयोग, अहिंसा और हृदय-परिवर्तन के समर्थक थे।
मार्क्सवाद उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व की समाप्ति का समर्थन करता है। गांधीजी ने अनिवार्य संपत्ति-उन्मूलन के स्थान पर न्यासिता अथवा Trusteeship का सिद्धांत प्रस्तुत किया।
आर्थिक नियतिवाद मार्क्सवादी विचार से संबंधित है। गांधीवाद में सत्य, अहिंसा, नैतिकता और मानवीय चेतना को निर्णायक महत्त्व दिया गया है।