Previous Year Question
लोक अदालतों के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
लोक अदालतों को मुकदमा-पूर्व चरण के मामलों का निपटारा करने की अधिकारिता है, लेकिन किसी न्यायालय के समक्ष लंबित मामलों की नहीं।
लोक अदालतें दीवानी प्रकृति के मामलों पर विचार कर सकती हैं, दांडिक प्रकृति के मामलों पर नहीं।
प्रत्येक लोक अदालत में केवल सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी होते हैं, कोई अन्य व्यक्ति नहीं।
उपर्युक्त में से कोई नहीं।
Correct Answer: D
Detailed Solution
लोक अदालतों को विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत वैधानिक दर्जा प्राप्त है। इनका उद्देश्य पक्षकारों की सहमति से विवादों का त्वरित, सस्ता और सौहार्दपूर्ण निपटारा करना है।
विकल्प (a) गलत है। लोक अदालत मुकदमा-पूर्व चरण के विवादों के साथ किसी न्यायालय में पहले से लंबित मामलों का भी निपटारा कर सकती है। लंबित मामला पक्षकारों की सहमति से अथवा न्यायालय द्वारा समझौते की संभावना पाए जाने पर लोक अदालत को भेजा जा सकता है।
विकल्प (b) गलत है। लोक अदालतें केवल दीवानी मामलों तक सीमित नहीं हैं। वे समझौता योग्य दांडिक अपराधों से संबंधित मामलों का भी निपटारा कर सकती हैं। लेकिन जिस अपराध का कानून के अंतर्गत समझौता नहीं किया जा सकता, उससे संबंधित मामले पर लोक अदालत को अधिकारिता प्राप्त नहीं है।
उदाहरण के लिए वैवाहिक विवाद, मोटर दुर्घटना प्रतिकर, बैंक ऋण, श्रम विवाद, भूमि अधिग्रहण, सार्वजनिक उपयोगिता बिल और समझौता योग्य दांडिक मामले लोक अदालत में निपटाए जा सकते हैं।
विकल्प (c) गलत है। लोक अदालत में सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी के साथ विधिक व्यवसाय से जुड़े व्यक्ति तथा निर्धारित योग्यता रखने वाले अन्य व्यक्ति भी सदस्य हो सकते हैं। इनमें अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता सम्मिलित हो सकते हैं। इसलिए इसकी संरचना केवल न्यायिक अधिकारियों तक सीमित नहीं है।
लोक अदालत स्वयं विवाद का गुण-दोष के आधार पर बाध्यकारी न्यायनिर्णय नहीं करती; उसका मुख्य कार्य पक्षकारों के बीच समझौता कराना है। यदि समझौता नहीं होता, तो सामान्य लोक अदालत मामले का निर्णय थोप नहीं सकती और मामला संबंधित न्यायालय को लौट जाता है अथवा पक्षकार उचित न्यायालय में जा सकते हैं।
समझौते के आधार पर लोक अदालत द्वारा दिया गया अधिनिर्णय दीवानी न्यायालय की डिक्री माना जाता है। वह सभी पक्षकारों पर अंतिम और बाध्यकारी होता है तथा उसके विरुद्ध सामान्य अपील का प्रावधान नहीं है। लोक अदालत में न्यायालय शुल्क नहीं लिया जाता और लंबित मामले में पहले दिया गया न्यायालय शुल्क समझौता होने पर वापस किया जा सकता है।