Previous Year Question
भारत में, न्यायिक पुनर्विलोकन का तात्पर्य है—
विधियों और कार्यपालिका के आदेशों की संवैधानिकता पर निर्णय देने की न्यायपालिका की शक्ति।
विधानमंडलों द्वारा अधिनियमित विधियों के औचित्य पर प्रश्न उठाने की न्यायपालिका की शक्ति।
राष्ट्रपति द्वारा अनुमति दिए जाने से पहले सभी विधायी अधिनियमनों का पुनर्विलोकन करने की न्यायपालिका की शक्ति।
समान अथवा भिन्न मामलों में पहले दिए गए अपने निर्णयों का पुनर्विलोकन करने की न्यायपालिका की शक्ति।
Correct Answer: A
Detailed Solution
न्यायिक पुनर्विलोकन—Judicial Review न्यायपालिका की वह शक्ति है जिसके अंतर्गत वह विधायिका द्वारा बनाई गई विधियों और कार्यपालिका द्वारा किए गए कार्यों या जारी आदेशों की संवैधानिक वैधता की जाँच करती है।
यदि कोई विधि अथवा कार्यपालिका कार्रवाई:
संविधान के किसी प्रावधान का उल्लंघन करती है;
मूल अधिकारों का अतिक्रमण करती है;
संबंधित विधायिका या प्राधिकारी की क्षमता से बाहर है;
संविधान द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन करती है; अथवा
मनमानी, दुर्भावनापूर्ण या विधि के शासन के विरुद्ध है,
तो न्यायालय उसे असंवैधानिक और अविधिमान्य घोषित कर सकता है।
संवैधानिक आधार
संविधान में “न्यायिक पुनर्विलोकन” को किसी एक अनुच्छेद में पूर्ण रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। यह शक्ति अनेक प्रावधानों से प्राप्त होती है:
अनुच्छेद 13: मूल अधिकारों से असंगत विधि असंगति की सीमा तक शून्य होती है।
अनुच्छेद 32: मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्चतम न्यायालय जाने का अधिकार देता है।
अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालयों को मूल अधिकारों और अन्य विधिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की शक्ति देता है।
अनुच्छेद 245 और 246: संसद और राज्य विधानमंडलों की क्षेत्रीय तथा विषयगत विधायी क्षमता निर्धारित करते हैं।
अनुच्छेद 368: संसद की संविधान संशोधन शक्ति निर्धारित करता है, जो मूल संरचना की सीमा के अधीन है।
उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक पुनर्विलोकन को संविधान की मूल संरचना का भाग माना है। इसलिए संसद संविधान संशोधन द्वारा भी न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं?
विकल्प (b): न्यायालय सामान्यतः किसी विधि की राजनीतिक समझदारी, उपयुक्तता या नीतिगत औचित्य का मूल्यांकन नहीं करता। उसका कार्य विधि की संवैधानिकता और वैधता जाँचना है।
विकल्प (c): भारत में संसद द्वारा पारित प्रत्येक विधेयक को राष्ट्रपति की अनुमति से पहले न्यायपालिका के अनिवार्य पूर्व-परीक्षण हेतु नहीं भेजा जाता। न्यायिक पुनर्विलोकन किसी वास्तविक विवाद या न्यायिक कार्यवाही में किया जाता है।
विकल्प (d): अपने पूर्व निर्णय की पुनः जाँच करना Review Jurisdiction है। यह न्यायिक पुनर्विलोकन की व्यापक संवैधानिक अवधारणा से अलग है। उच्चतम न्यायालय की समीक्षा शक्ति अनुच्छेद 137 में दी गई है।