Previous Year Question
भारतीय न्यायपालिका के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
भारत के उच्चतम न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को भारत के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा भारत के राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में बैठने और कार्य करने के लिए वापस बुलाया जा सकता है।
भारत के किसी उच्च न्यायालय को अपने स्वयं के निर्णय की समीक्षा करने की शक्ति प्राप्त है, जैसा कि उच्चतम न्यायालय करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
केवल 1
केवल 2
1 और 2 दोनों
न तो 1, न ही 2
Correct Answer: C
Detailed Solution
कथन 1 सही है
संविधान का अनुच्छेद 128 उच्चतम न्यायालय की बैठकों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की उपस्थिति से संबंधित है।
भारत का मुख्य न्यायमूर्ति राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से निम्नलिखित व्यक्तियों से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में बैठने और कार्य करने का अनुरोध कर सकता है:
उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश;
पूर्व संघीय न्यायालय के न्यायाधीश; अथवा
किसी उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए विधिवत अर्हित हो।
संबंधित व्यक्ति की सहमति भी आवश्यक है; उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध बैठने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
जब ऐसा व्यक्ति उच्चतम न्यायालय में बैठता और कार्य करता है:
उसे राष्ट्रपति के आदेश द्वारा निर्धारित भत्ते प्राप्त होते हैं।
उसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की अधिकारिता, शक्तियाँ और विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं।
केवल इस आधार पर उसे स्थायी रूप से उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नहीं माना जाता।
कथन 2 सही है
उच्च न्यायालय को भी अपने निर्णय या आदेश की समीक्षा करने की शक्ति प्राप्त है।
उच्चतम न्यायालय की समीक्षा शक्ति का स्पष्ट संवैधानिक आधार अनुच्छेद 137 है। इसके अनुसार उच्चतम न्यायालय संसद द्वारा बनाई गई विधि और अनुच्छेद 145 के अंतर्गत बनाए गए नियमों के अधीन अपने निर्णयों एवं आदेशों की समीक्षा कर सकता है।
उच्च न्यायालय के लिए अनुच्छेद 137 के समान कोई अलग और स्पष्ट अनुच्छेद नहीं है, फिर भी:
अनुच्छेद 215 प्रत्येक उच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय घोषित करता है।
अनुच्छेद 226 के अंतर्गत अपनी रिट अधिकारिता का प्रयोग करते समय उच्च न्यायालय को अपने आदेश की समीक्षा करने की अंतर्निहित शक्ति प्राप्त है।
दीवानी मामलों में समीक्षा की प्रक्रिया सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 114 और आदेश XLVII द्वारा भी विनियमित होती है।
उच्च न्यायालय प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने, स्पष्ट त्रुटि सुधारने और न्याय की विफलता रोकने के लिए समीक्षा कर सकता है।
समीक्षा और अपील में अंतर
समीक्षा किसी मामले की पुनः पूर्ण सुनवाई नहीं है। सामान्यतः समीक्षा इन आधारों पर की जाती है:
उचित परिश्रम के बावजूद पहले उपलब्ध न हो सकने वाले नए और महत्त्वपूर्ण साक्ष्य की खोज;
अभिलेख पर प्रत्यक्ष दिखाई देने वाली त्रुटि; अथवा
कोई अन्य पर्याप्त कारण।
अपील में उच्चतर न्यायालय निचले न्यायालय के निर्णय की जाँच करता है, जबकि समीक्षा में वही न्यायालय अपने निर्णय की सीमित आधारों पर पुनः जाँच करता है।