Previous Year Question
भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
सरकारी विधि अधिकारी और विधिक फर्म अधिवक्ताओं के रूप में मान्यता प्राप्त हैं, किंतु निगमित वकील और पेटेंट न्यायवादी अधिवक्ताओं की मान्यता से बाहर रखे गए हैं।
विधिज्ञ परिषदों को विधिक शिक्षा और विधि महाविद्यालयों की मान्यता के विषय में नियम अधिकथित करने की शक्ति है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
केवल 1
केवल 2
1 और 2 दोनों
न तो 1, न ही 2
Correct Answer: B
Detailed Solution
कथन 1 गलत है
अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत किसी व्यक्ति को अधिवक्ता के रूप में मान्यता उसके रोजगार के सामान्य पदनाम—जैसे सरकारी विधि अधिकारी, निगमित वकील या पेटेंट न्यायवादी—से निर्धारित नहीं होती। इसका आधार मुख्यतः संबंधित राज्य विधिज्ञ परिषद् की नामावली में विधिवत नामांकन है।
अधिनियम की धारा 2(1)(a) के अनुसार “अधिवक्ता” से अभिप्राय उस अधिवक्ता से है जिसका नाम अधिनियम के अंतर्गत तैयार की गई नामावली में दर्ज है।
धारा 17 राज्य विधिज्ञ परिषदों द्वारा अधिवक्ताओं की राज्य नामावली तैयार और बनाए रखने से संबंधित है।
धारा 24 नामांकन के लिए नागरिकता, आयु, विधि की उपाधि और अन्य आवश्यक अर्हताएँ निर्धारित करती है।
धारा 29 के अनुसार विधि-व्यवसाय करने के लिए मान्यता प्राप्त व्यक्तियों का एकमात्र वर्ग “अधिवक्ता” है।
सरकारी विधि अधिकारी अथवा किसी निगम के विधि अधिकारी को आवश्यक अर्हताएँ और नामांकन पूरा करने पर अधिवक्ता माना जा सकता है।
पेटेंट अधिनियम के अंतर्गत पेटेंट अभिकर्ता के रूप में पंजीकरण अपने-आप किसी व्यक्ति को अधिवक्ता नहीं बनाता; लेकिन विधि-अर्हता और विधिज्ञ परिषद् में नामांकन होने पर वही व्यक्ति अधिवक्ता भी हो सकता है।
किसी विधिक फर्म को स्वयं एक प्राकृतिक व्यक्ति की तरह राज्य नामावली में अधिवक्ता के रूप में दर्ज नहीं किया जाता। फर्म से जुड़े योग्य और नामांकित व्यक्ति अधिवक्ता होते हैं।
पूर्णकालिक वेतनभोगी रोजगार में लगे अधिवक्ता के विधि-व्यवसाय पर भारतीय विधिज्ञ परिषद् के नियमों के अंतर्गत प्रतिबंध हो सकते हैं। लेकिन कथन द्वारा सरकारी विधि अधिकारियों एवं विधिक फर्मों को मान्यता देना और निगमित वकीलों तथा पेटेंट न्यायवादियों को पूर्णतः बाहर रखना सही कानूनी वर्गीकरण नहीं है।
कथन 2 सही है
अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 7 भारतीय विधिज्ञ परिषद् के कार्यों को निर्धारित करती है।
इसके अंतर्गत भारतीय विधिज्ञ परिषद्:
विधिक शिक्षा को प्रोत्साहित करती है।
विश्वविद्यालयों और राज्य विधिज्ञ परिषदों के परामर्श से विधिक शिक्षा के मानक निर्धारित करती है।
उन विश्वविद्यालयों को मान्यता देती है जिनकी विधि की उपाधि अधिवक्ता के रूप में नामांकन के लिए अर्हता मानी जाएगी।
विश्वविद्यालयों एवं विधि महाविद्यालयों का निरीक्षण करती है अथवा निरीक्षण करवाती है।
अधिवक्ताओं के व्यावसायिक आचरण और शिष्टाचार के मानक निर्धारित करती है।
अनुशासन और विधि-व्यवसाय से संबंधित नियम बनाती है।
भारतीय विधिज्ञ परिषद् ने अपनी नियम-निर्माण शक्ति के अंतर्गत विधिक शिक्षा नियम बनाए हैं, जो विधि पाठ्यक्रमों, आधारभूत संरचना, अध्यापकों, शैक्षणिक मानकों और विधि संस्थानों की मान्यता से संबंधित हैं।