JAGTIV · Previous Year Questions

UPSC

POLITY · 2025

Previous Year Question

भारतीय राजव्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

I. किसी राज्य का राज्यपाल अपने पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के पालन के लिए किसी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं है।

II. राज्यपाल की पदावधि के दौरान उसके विरुद्ध कोई दांडिक कार्यवाही संस्थित नहीं की जाएगी अथवा जारी नहीं रखी जाएगी।

III. राज्य विधानमंडल के सदस्य सदन के भीतर कही गई किसी बात के संबंध में किसी न्यायालय में किसी कार्यवाही के लिए उत्तरदायी नहीं हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

A.

केवल I और II

B.

केवल II और III

C.

केवल I और III

D.

I, II और III

Correct Answer: D

Detailed Solution

कथन I सही है

अनुच्छेद 361(1) के अनुसार राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल अपने पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के पालन के लिए या उनके प्रयोग और पालन में किए गए अथवा किए जाने का तात्पर्य रखने वाले किसी कार्य के लिए किसी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं है।

लेकिन इस प्रतिरक्षा का अर्थ यह नहीं है कि राज्यपाल द्वारा की गई कार्रवाई न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह बाहर हो जाती है।

  • न्यायालय राज्यपाल को व्यक्तिगत रूप से उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

  • राज्यपाल के नाम से की गई सरकारी कार्रवाई की संवैधानिक वैधता की समीक्षा की जा सकती है।

  • राज्य सरकार के विरुद्ध उपयुक्त न्यायिक कार्यवाही की जा सकती है।

  • अनुच्छेद 361 सरकारी कार्रवाई को निरपेक्ष न्यायिक प्रतिरक्षा प्रदान नहीं करता।

कथन II सही है

अनुच्छेद 361(2) के अनुसार राष्ट्रपति या राज्यपाल की पदावधि के दौरान उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई दांडिक कार्यवाही—

  • संस्थित नहीं की जा सकती; और

  • पहले से चल रही हो तो जारी नहीं रखी जा सकती।

इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 361(3) के अनुसार उसकी पदावधि के दौरान गिरफ्तारी या कारावास के लिए कोई न्यायिक आदेश जारी नहीं किया जा सकता।

यह प्रतिरक्षा पदावधि तक रहती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि कथित व्यक्तिगत दांडिक दायित्व स्थायी रूप से समाप्त हो जाता है।

व्यक्तिगत कार्य से संबंधित दीवानी कार्यवाही के लिए अनुच्छेद 361(4) के अंतर्गत निर्धारित शर्तों और दो महीने की पूर्व सूचना का पालन आवश्यक है।

कथन III सही है

अनुच्छेद 194(2) के अनुसार राज्य विधानमंडल का कोई सदस्य—

  • विधानमंडल में कही गई किसी बात; अथवा

  • विधानमंडल या उसकी किसी समिति में दिए गए किसी मत

के संबंध में किसी न्यायालय की कार्यवाही के लिए उत्तरदायी नहीं होगा।

इसी प्रकार सदन के प्राधिकार के अधीन प्रकाशित प्रतिवेदन, पत्र, मत या कार्यवाही के संबंध में भी न्यायिक दायित्व से संरक्षण मिलता है।

यह विशेषाधिकार विधायी कार्यों तक सीमित है। सदन के बाहर वही बात दोहराने अथवा विधानमंडलीय कार्य से असंबद्ध व्यक्तिगत कार्य करने पर यह प्रतिरक्षा स्वतः उपलब्ध नहीं होती।

संबंधित अनुच्छेद

  • संसद के सदस्यों के लिए इसी प्रकार का विशेषाधिकार अनुच्छेद 105(2) में है।

  • राज्य विधानमंडलों के सदस्यों का विशेषाधिकार अनुच्छेद 194(2) में है।

  • राष्ट्रपति और राज्यपालों को पद-संबंधी न्यायिक प्रतिरक्षा अनुच्छेद 361 प्रदान करता है।

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