Previous Year Question
लोक सभा अध्यक्ष के पद के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पद धारण करता/करती है।
अपने निर्वाचन के समय उसका सदन का सदस्य होना आवश्यक नहीं है, किन्तु उसे अपने निर्वाचन की तारीख से छह माह के अन्दर सदन का सदस्य हो जाना पड़ेगा।
यदि वह त्यागपत्र देने का विचार करे, तो उसे अपना त्यागपत्र लोक सभा उपाध्यक्ष को संबोधित करना होगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
केवल 1 और 2
केवल 3
1, 2 और 3
कोई नहीं
Correct Answer: B
Detailed Solution
कथन 1 गलत है। लोकसभा अध्यक्ष राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पद धारण नहीं करता। उसके पद की अवधि और पद रिक्त होने की परिस्थितियाँ संविधान के अनुच्छेद 94 द्वारा निर्धारित होती हैं।
अध्यक्ष का पद निम्न स्थितियों में रिक्त होता है:
वह लोकसभा का सदस्य नहीं रहता।
वह लोकसभा उपाध्यक्ष को लिखित त्यागपत्र देता है।
लोकसभा उसे तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा पद से हटा देती है।
कथन 2 गलत है। संविधान के अनुच्छेद 93 के अनुसार लोकसभा अपने दो सदस्यों को क्रमशः अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनती है। इसलिए अध्यक्ष चुने जाते समय व्यक्ति का लोकसभा का सदस्य होना अनिवार्य है।
छह महीने में संसद का सदस्य बनने वाला नियम मंत्रियों के लिए अनुच्छेद 75(5) में है। यह लोकसभा अध्यक्ष पर लागू नहीं होता।
कथन 3 सही है। अनुच्छेद 94(b) के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष अपना त्यागपत्र लोकसभा उपाध्यक्ष को संबोधित करता है। इसी प्रकार उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को संबोधित करता है।
अध्यक्ष को पद से हटाने की प्रक्रिया
अध्यक्ष को लोकसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा हटाया जा सकता है।
ऐसा प्रस्ताव प्रस्तुत करने से पहले कम-से-कम 14 दिन की सूचना देना आवश्यक है।
अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन होने पर अध्यक्ष सदन की अध्यक्षता नहीं करता।
अनुच्छेद 96(2) के अनुसार वह कार्यवाही में उपस्थित होकर बोल सकता है और प्रथम बार मतदान कर सकता है, लेकिन मत बराबर होने पर निर्णायक मत नहीं दे सकता।
लोकसभा के विघटन के बाद स्थिति
सामान्यतः सदस्यता समाप्त होने पर अध्यक्ष का पद भी रिक्त हो जाता है। लेकिन संसदीय निरंतरता बनाए रखने के लिए अनुच्छेद 94 के परन्तुक के अनुसार लोकसभा के विघटन के बाद भी अध्यक्ष नई लोकसभा की पहली बैठक के ठीक पहले तक पद पर बना रहता है।
अध्यक्ष की प्रमुख शक्तियाँ
लोकसभा की बैठकों की अध्यक्षता और सदन में अनुशासन बनाए रखना।
किसी विधेयक के धन विधेयक होने का अंतिम निर्णय करना।
मत बराबर होने पर निर्णायक मत देना।
संसद की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता करना।
सदन के नियमों की व्याख्या करना और व्यवस्था का प्रश्न निर्धारित करना।
दलबदल से संबंधित मामलों में दसवीं अनुसूची के अंतर्गत निर्णय देना।
विभिन्न संसदीय समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति तथा उनके कार्यों की निगरानी करना।