JAGTIV · Previous Year Questions

UPSC

POLITY · 2019

Previous Year Question

निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. संसद (निरर्हता निवारण) अधिनियम, 1959 कई पदों को ‘लाभ का पद’ के आधार पर निरर्हता से छूट देता है।

  2. उपर्युक्त अधिनियम में पाँच बार संशोधन किया गया है।

  3. ‘लाभ का पद’ शब्द भारत के संविधान में भली-भाँति परिभाषित किया गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A.

1 और 2

B.

केवल 3

C.

2 और 3

D.

1, 2 और 3

Correct Answer: A

Detailed Solution

कथन 1 सही है। संविधान के अनुच्छेद 102(1)(a) के अनुसार, संसद का कोई सदस्य केंद्र या राज्य सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करने पर निरर्ह हो सकता है। लेकिन संसद कानून द्वारा कुछ पदों को इस निरर्हता से मुक्त घोषित कर सकती है। इसी उद्देश्य से संसद (निरर्हता निवारण) अधिनियम, 1959 में अनेक पदों को सूचीबद्ध करके छूट प्रदान की गई है।

कथन 2 सही है। प्रश्न पूछे जाने तक इस अधिनियम में पाँच बार—1960, 1992, 1993, 2006 और 2013 में—संशोधन किया गया था।

कथन 3 गलत है। संविधान में ‘लाभ का पद’ पदावली की कोई स्पष्ट अथवा विस्तृत परिभाषा नहीं दी गई है। इसका निर्धारण न्यायालयों द्वारा विकसित विभिन्न कसौटियों के आधार पर किया जाता है, जैसे:

  • पदाधिकारी की नियुक्ति कौन करता है;

  • उसे पद से हटाने की शक्ति किसके पास है;

  • वेतन, भत्ता अथवा अन्य आर्थिक लाभ सरकार देती है या नहीं;

  • सरकार का पद और उसके कार्यों पर कितना नियंत्रण है;

  • पदाधिकारी द्वारा किए जाने वाले कार्यों की प्रकृति क्या है।

इनमें से कोई एक कसौटी अपने-आप में निर्णायक नहीं होती; प्रत्येक मामले की वास्तविक परिस्थितियों को समग्र रूप से देखा जाता है।

अनुच्छेद 102 के स्पष्टीकरण के अनुसार, केवल केंद्र या राज्य सरकार का मंत्री होने के कारण किसी व्यक्ति को लाभ का पद धारण करने वाला नहीं माना जाएगा।

यदि संसद के किसी वर्तमान सदस्य की निरर्हता का प्रश्न उत्पन्न होता है, तो अनुच्छेद 103 के अनुसार राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय प्राप्त करके निर्णय करता है। राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय के अनुसार कार्य करता है। राज्य विधानमंडल के सदस्यों के लिए इसी प्रकार की व्यवस्था अनुच्छेद 192 में है।

लाभ के पद संबंधी निरर्हता का उद्देश्य विधायकों की स्वतंत्रता बनाए रखना, कार्यपालिका के अनुचित संरक्षण को रोकना तथा हितों के टकराव से बचना है।

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