Previous Year Question
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
भारत का महान्यायवादी और भारत का सॉलिसिटर जनरल ही सरकार के एकमात्र ऐसे अधिकारी हैं जिन्हें भारत की संसद की बैठकों में भाग लेने की अनुमति है।
भारत के संविधान के अनुसार, भारत का महान्यायवादी अपना त्यागपत्र तब देता है जब उसे नियुक्त करने वाली सरकार त्यागपत्र देती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/कौन-से सही है/हैं?
केवल 1
केवल 2
1 और 2 दोनों
न तो 1, न ही 2
Correct Answer: D
Detailed Solution
कथन 1 गलत है। अनुच्छेद 88 केवल भारत के महान्यायवादी को संसद के दोनों सदनों, उनकी संयुक्त बैठक और उस संसदीय समिति की कार्यवाही में बोलने तथा भाग लेने का संवैधानिक अधिकार देता है जिसका वह सदस्य नामित किया गया हो। उसे मतदान का अधिकार नहीं होता।
सॉलिसिटर जनरल का पद संविधान में उल्लिखित नहीं है। वह भारत सरकार का विधि अधिकारी है, लेकिन उसे महान्यायवादी के समान अनुच्छेद 88 के अंतर्गत संसद की कार्यवाही में भाग लेने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 88 संघ के प्रत्येक मंत्री को भी किसी भी सदन, दोनों सदनों की संयुक्त बैठक और संबंधित समिति की कार्यवाही में बोलने एवं भाग लेने का अधिकार देता है। इसलिए महान्यायवादी और सॉलिसिटर जनरल को “एकमात्र अधिकारी” बताना गलत है।
महान्यायवादी से संबंधित अनुच्छेद 76 के प्रमुख प्रावधान:
उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
उसमें उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने की योग्यता होनी चाहिए।
वह भारत सरकार को विधिक विषयों पर सलाह देता है।
वह राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गए विधिक कर्तव्यों का पालन करता है।
उसे भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है।
वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।
उसका पारिश्रमिक राष्ट्रपति निर्धारित करता है।
कथन 2 गलत है। संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि सरकार के त्यागपत्र देते ही महान्यायवादी को अनिवार्य रूप से त्यागपत्र देना होगा।
संविधान:
महान्यायवादी का निश्चित कार्यकाल निर्धारित नहीं करता।
उसके त्यागपत्र की प्रक्रिया और आधार निर्धारित नहीं करता।
केवल यह कहता है कि वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा।
व्यवहार में महान्यायवादी सामान्यतः सरकार बदलने या मंत्रिपरिषद के त्यागपत्र देने पर अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को सौंपता है, क्योंकि उसकी नियुक्ति सरकार की सलाह पर हुई होती है। लेकिन यह संवैधानिक बाध्यता नहीं, बल्कि परंपरा है।