Previous Year Question
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
I. यदि कोई प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या लोक सभा का कोई सदस्य दसवीं अनुसूची के अधीन निरर्हता से ग्रस्त हो गया है, तो संघ की मंत्रिपरिषद की राय के अनुसार राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होगा।
II. भारत के संविधान में ‘राजनीतिक दल’ शब्द का कोई उल्लेख नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/कौन-से सही है/हैं?
केवल I
केवल II
I और II दोनों
न तो I, न ही II
Correct Answer: D
Detailed Solution
कथन I गलत है। दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दल-बदल के आधार पर संसद-सदस्य की निरर्हता का निर्णय राष्ट्रपति नहीं करता।
दसवीं अनुसूची के पैरा 6 के अनुसार:
लोकसभा सदस्य की निरर्हता का प्रश्न लोकसभा अध्यक्ष तय करता है।
राज्यसभा सदस्य की निरर्हता का प्रश्न राज्यसभा के सभापति द्वारा तय किया जाता है।
राज्य विधानमंडल में संबंधित सदन का अध्यक्ष अथवा सभापति निर्णय करता है।
पीठासीन अधिकारी का निर्णय सीमित न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है।
इसे संविधान के अनुच्छेद 102(1) के अंतर्गत आने वाली सामान्य निरर्हताओं से अलग समझना चाहिए। लाभ का पद, विकृतचित्तता, अनुन्मोचित दिवालियापन अथवा नागरिकता जैसी निरर्हताओं का प्रश्न उठने पर अनुच्छेद 103 के अनुसार राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय प्राप्त करके निर्णय करता है। यहाँ भी राष्ट्रपति संघ की मंत्रिपरिषद की राय के अनुसार निर्णय नहीं करता, बल्कि निर्वाचन आयोग की राय के अनुसार कार्य करता है।
कथन II भी गलत है। संविधान की दसवीं अनुसूची में ‘राजनीतिक दल’ शब्द का स्पष्ट रूप से अनेक स्थानों पर प्रयोग किया गया है। दसवीं अनुसूची वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ी गई थी।
दसवीं अनुसूची के अनुसार किसी सदस्य को सामान्यतः निम्न आधारों पर निरर्ह ठहराया जा सकता है:
स्वेच्छा से अपने राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ना।
दल के निर्देश के विपरीत मतदान करना अथवा मतदान से अनुपस्थित रहना और 15 दिनों के भीतर दल से क्षमा प्राप्त न करना।
निर्दलीय निर्वाचित सदस्य का निर्वाचन के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होना।
नामनिर्देशित सदस्य का सदन में स्थान ग्रहण करने के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होना।
अतः दोनों कथन गलत हैं।