JAGTIV · Previous Year Questions

UPSC

POLITY · 2015

Previous Year Question

राज्य की नीति के निदेशक तत्त्वों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. ये तत्त्व देश के सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र की व्याख्या करते हैं।

  2. इन तत्त्वों में अंतर्विष्ट उपबंध किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

A.

केवल 1

B.

केवल 2

C.

1 और 2 दोनों

D.

न तो 1, न ही 2

Correct Answer: C

Detailed Solution

दोनों कथन सही हैं। संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व दिए गए हैं। इनका उद्देश्य भारत में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र स्थापित करना तथा कल्याणकारी राज्य का निर्माण करना है।

कथन 1 सही है। मूल अधिकार मुख्यतः राजनीतिक लोकतंत्र को सुरक्षित करते हैं, जबकि निदेशक तत्त्व सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की दिशा निर्धारित करते हैं।

सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र से आशय ऐसी व्यवस्था से है जिसमें नागरिकों को केवल राजनीतिक समानता ही नहीं, बल्कि आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय और सामाजिक सुरक्षा के वास्तविक अवसर भी प्राप्त हों।

इस उद्देश्य से संबंधित प्रमुख निदेशक तत्त्व हैं:

  • अनुच्छेद 38: न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था और असमानताओं को कम करना।

  • अनुच्छेद 39: आजीविका, संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण, धन के संकेंद्रण को रोकना, समान वेतन तथा श्रमिकों एवं बच्चों की सुरक्षा।

  • अनुच्छेद 39A: समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता।

  • अनुच्छेद 41: काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता।

  • अनुच्छेद 42: न्यायसंगत एवं मानवीय कार्य-दशाएँ और प्रसूति सहायता।

  • अनुच्छेद 43: निर्वाह मजदूरी और सम्मानजनक जीवन स्तर।

  • अनुच्छेद 46: दुर्बल वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की अभिवृद्धि।

  • अनुच्छेद 47: पोषण, जीवन स्तर और लोक स्वास्थ्य में सुधार।

कथन 2 सही है। अनुच्छेद 37 स्पष्ट करता है कि भाग IV में अंतर्विष्ट उपबंध किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होंगे। इसलिए निदेशक तत्त्व अ-न्यायोचित या Non-justiciable हैं।

लेकिन अनुच्छेद 37 यह भी कहता है कि:

  • ये तत्त्व देश के शासन में मूलभूत हैं।

  • कानून बनाते समय इन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य है।

इसलिए इनका पालन केवल नैतिक इच्छा पर निर्भर नहीं है; ये विधायिका और कार्यपालिका के लिए संवैधानिक निर्देश हैं। इनके अनुपालन को सीधे न्यायालय में लागू नहीं कराया जा सकता, परंतु निर्वाचित सरकारें इनके लिए राजनीतिक रूप से जनता के प्रति उत्तरदायी होती हैं।

निदेशक तत्त्वों के प्रभाव से अनेक संस्थागत और कानूनी व्यवस्थाएँ विकसित हुई हैं—निःशुल्क विधिक सहायता, पंचायती राज, श्रमिक कल्याण, शिक्षा, लोक स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण तथा सामाजिक सुरक्षा इनमें प्रमुख हैं।

न्यायालय मूल अधिकारों की व्याख्या करते समय निदेशक तत्त्वों का उपयोग भी करते हैं। संविधान की व्याख्या में भाग III और भाग IV के बीच सामंजस्य बनाए रखना आवश्यक माना गया है।

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