Previous Year Question
निम्नलिखित में से कौन-से ‘विधि के शासन’ के मुख्य लक्षण हैं?
शक्तियों का परिसीमन
विधि के समक्ष समता
सरकार के प्रति लोगों का उत्तरदायित्व
स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
केवल 1 और 3
केवल 2 और 4
केवल 1, 2 और 4
1, 2, 3 और 4
Correct Answer: C
Detailed Solution
‘विधि के शासन’ का अर्थ है कि शासन संविधान और विधि के अधीन संचालित होगा तथा सार्वजनिक शक्ति का प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। इसमें शासक और शासित, दोनों विधि के अधीन होते हैं।
कथन 1 सही है। शक्तियों का परिसीमन विधि के शासन का आधारभूत तत्त्व है। सरकार और उसके अधिकारी केवल वही शक्तियाँ प्रयोग कर सकते हैं जो उन्हें संविधान अथवा विधि द्वारा प्रदान की गई हैं। सार्वजनिक शक्ति के मनमाने प्रयोग को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
कथन 2 सही है। विधि के समक्ष समता संविधान के अनुच्छेद 14 में दी गई है। इसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति विधि से ऊपर नहीं है और समान परिस्थितियों में व्यक्तियों पर समान कानून लागू होगा।
अनुच्छेद 14 के दो आयाम हैं:
विधि के समक्ष समता: किसी व्यक्ति को विशेष कानूनी विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होगा।
विधियों का समान संरक्षण: समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाएगा।
कथन 3 गलत है। लोकतांत्रिक शासन में सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है, न कि जनता सरकार के प्रति। नागरिकों का कानून का पालन करने का दायित्व होता है, लेकिन इसे सरकार के प्रति जनता का राजनीतिक उत्तरदायित्व नहीं कहा जाता। इसलिए यह विधि के शासन का मुख्य लक्षण नहीं है।
कथन 4 सही है। स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार विधि के शासन के केंद्रीय तत्त्व हैं। संविधान नागरिकों और व्यक्तियों को अधिकार प्रदान करता है तथा उनके उल्लंघन पर न्यायिक उपचार भी उपलब्ध कराता है।
भारत में विधि के शासन को निम्न संवैधानिक प्रावधान मजबूत करते हैं:
अनुच्छेद 13 मूल अधिकारों के विरुद्ध कानूनों को असंगति की सीमा तक अमान्य करता है।
अनुच्छेद 14 मनमानी राज्य कार्रवाई के विरुद्ध समानता प्रदान करता है।
अनुच्छेद 19 नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है।
अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण करता है।
अनुच्छेद 32 और 226 क्रमशः सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की शक्ति देते हैं।
अनुच्छेद 265 के अनुसार विधि के प्राधिकार के बिना कोई कर लगाया या एकत्र नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 300A के अनुसार विधि के प्राधिकार के बिना किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।
‘विधि का शासन’ और ‘विधि द्वारा शासन’ समान नहीं हैं। केवल कानून का अस्तित्व पर्याप्त नहीं है; कानून और उसका प्रयोग संवैधानिक, गैर-मनमाना, समान तथा न्यायिक समीक्षा के अधीन होना चाहिए।