JAGTIV · Previous Year Questions

UPSC

POLITY · 2022

Previous Year Question

भारत में न्यायालयों द्वारा जारी किए गए रिटों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. परमादेश (Mandamus) किसी प्राइवेट संगठन के विरुद्ध तब तक नहीं होगा, जब तक उसे कोई सार्वजनिक कर्तव्य नहीं सौंपा गया हो।

  2. परमादेश किसी कंपनी के विरुद्ध नहीं होगा, भले ही वह सरकारी कंपनी हो।

  3. कोई भी लोक-प्रवण व्यक्ति अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) का रिट प्राप्त करने के लिए न्यायालय जाने हेतु याची हो सकता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

A.

1 और 2

B.

2 और 3

C.

1 और 3

D.

1, 2 और 3

Correct Answer: C

Detailed Solution

कथन 1 सही है। परमादेश का अर्थ है—“हम आदेश देते हैं।” यह रिट किसी सार्वजनिक प्राधिकारी अथवा सार्वजनिक कर्तव्य का निर्वहन करने वाले निकाय को उस कर्तव्य को पूरा करने का आदेश देने के लिए जारी किया जाता है।

अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय किसी निजी संस्था के विरुद्ध भी परमादेश जारी कर सकता है, यदि:

  • संस्था को कोई सार्वजनिक या वैधानिक कर्तव्य सौंपा गया हो।

  • उसके कार्य में सार्वजनिक तत्त्व मौजूद हो।

  • जिस कर्तव्य के पालन की माँग की जा रही है, वह केवल निजी संविदात्मक दायित्व न होकर सार्वजनिक प्रकृति का हो।

इसलिए पूर्णतः निजी कार्य करने वाले निजी संगठन के विरुद्ध सामान्यतः परमादेश जारी नहीं होगा; परंतु सार्वजनिक कर्तव्य निभाने पर वह रिट के अधिकार-क्षेत्र में आ सकता है।

कथन 2 गलत है। सरकारी कंपनी केवल “कंपनी” होने के कारण परमादेश से मुक्त नहीं हो जाती। यदि वह:

  • संविधान के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत राज्य का साधन या अभिकरण हो; अथवा

  • सार्वजनिक अथवा वैधानिक कर्तव्य का निर्वहन करती हो,

तो उसके विरुद्ध परमादेश जारी किया जा सकता है। इसलिए यह कहना गलत है कि किसी सरकारी कंपनी के विरुद्ध परमादेश किसी भी परिस्थिति में जारी नहीं होगा।

कथन 3 सही है। अधिकार-पृच्छा का अर्थ है—“किस अधिकार से?” यह रिट न्यायालय द्वारा यह जाँचने के लिए जारी की जाती है कि कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक पद को किस वैधानिक अधिकार से धारण कर रहा है।

इसके लिए याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत अधिकार के उल्लंघन या व्यक्तिगत क्षति को सिद्ध करना आवश्यक नहीं है। कोई भी लोक-हितैषी व्यक्ति न्यायालय के समक्ष याचिका प्रस्तुत कर सकता है।

अधिकार-पृच्छा जारी करने की सामान्य शर्तें हैं:

  • संबंधित पद सार्वजनिक हो।

  • पद संविधान या विधि द्वारा सृजित हो।

  • पद वास्तविक और स्वतंत्र प्रकृति का हो।

  • पदधारक आवश्यक वैधानिक योग्यता पूरी न करता हो अथवा उसकी नियुक्ति विधि के विरुद्ध हुई हो।

पाँच संवैधानिक रिट

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण: गैर-कानूनी निरोध से व्यक्ति को मुक्त कराने के लिए।

  • परमादेश: सार्वजनिक कर्तव्य पूरा कराने के लिए।

  • प्रतिषेध: अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण को अधिकार-क्षेत्र से बाहर कार्य करने से रोकने के लिए।

  • उत्प्रेषण: अधीनस्थ न्यायालय या अधिकरण के अवैध आदेश को निरस्त करने के लिए।

  • अधिकार-पृच्छा: सार्वजनिक पद पर किसी व्यक्ति के अधिकार की वैधता जाँचने के लिए।

अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करता है। अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय मूल अधिकारों के साथ-साथ “किसी अन्य प्रयोजन” के लिए भी रिट जारी कर सकता है; इसलिए उच्च न्यायालय का रिट-अधिकार क्षेत्र अधिक व्यापक है।

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