Previous Year Question
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
भारत का संविधान अपनी ‘मूल संरचना’ को संघवाद, धर्मनिरपेक्षता, मूल अधिकारों और लोकतंत्र के रूप में परिभाषित करता है।
भारत का संविधान नागरिकों की स्वतंत्रता की सुरक्षा करने और उन आदर्शों को संरक्षित करने हेतु, जिन पर संविधान आधारित है, ‘न्यायिक पुनर्विलोकन’ की व्यवस्था करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
केवल 1
केवल 2
1 और 2 दोनों
न तो 1, न ही 2
Correct Answer: B
Detailed Solution
कथन 1 सही नहीं है। भारत के संविधान में “मूल संरचना” को परिभाषित करने वाला कोई अनुच्छेद अथवा निश्चित सूची नहीं दी गई है। मूल संरचना का सिद्धांत उच्चतम न्यायालय द्वारा संवैधानिक व्याख्या के माध्यम से विकसित किया गया है।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, 1973 में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद को संविधान में संशोधन करने की व्यापक शक्ति प्राप्त है, लेकिन संसद संविधान की मूल संरचना को नष्ट या परिवर्तित नहीं कर सकती।
न्यायालय ने एक अंतिम और पूर्ण सूची निर्धारित नहीं की। विभिन्न निर्णयों के माध्यम से निम्नलिखित तत्त्व मूल संरचना के अंतर्गत स्वीकार किए गए हैं:
संविधान की सर्वोच्चता;
गणतांत्रिक और लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था;
पंथनिरपेक्षता;
संघीय चरित्र;
शक्तियों का पृथक्करण;
विधि का शासन;
न्यायिक पुनर्विलोकन;
न्यायपालिका की स्वतंत्रता;
स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन;
मौलिक अधिकारों तथा राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों के बीच संतुलन;
संसद की संशोधन शक्ति की सीमित प्रकृति।
अतः संघवाद, पंथनिरपेक्षता, लोकतंत्र और मौलिक अधिकार मूल संरचना से संबंधित हो सकते हैं, लेकिन संविधान स्वयं मूल संरचना को इन शब्दों में परिभाषित नहीं करता। इसलिए कथन 1 गलत है।
कथन 2 सही है। संविधान में “Judicial Review” अभिव्यक्ति की एकल परिभाषा नहीं दी गई है, लेकिन अनेक संवैधानिक प्रावधान स्पष्ट रूप से न्यायिक पुनर्विलोकन की व्यवस्था करते हैं।
अनुच्छेद 13 के अनुसार मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाली विधि उल्लंघन की सीमा तक शून्य होगी। अनुच्छेद 32 उच्चतम न्यायालय और अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करते हैं। अनुच्छेद 131 से 136 उच्चतम न्यायालय की विभिन्न अधिकारिताओं से संबंधित हैं।
न्यायिक पुनर्विलोकन के माध्यम से संवैधानिक न्यायालय जाँचते हैं कि:
विधायिका ने अपनी संवैधानिक विधायी क्षमता के भीतर कानून बनाया है या नहीं;
कोई कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है या नहीं;
कार्यपालिका की कार्रवाई संविधान और विधि के अनुरूप है या नहीं;
कोई संविधान संशोधन संविधान की मूल संरचना को क्षति पहुँचाता है या नहीं।
इस प्रकार न्यायिक पुनर्विलोकन नागरिकों की स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है, सरकारी शक्तियों को संवैधानिक सीमाओं में रखता है और संविधान के आधारभूत आदर्शों को सुरक्षित करता है।