Previous Year Question
भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सी पर्यावरण-अनुकूली कृषि की पद्धति/पद्धतियाँ मानी जाती है/हैं?
फसल विविधीकरण
दलहन गहनता
टेन्सियोमीटर का प्रयोग
ऊर्ध्वाधर कृषि
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
1, 2 और 3
केवल 3
केवल 4
1, 2, 3 और 4
Correct Answer: A
Detailed Solution
1. फसल विविधीकरण—पर्यावरण-अनुकूली कृषि पद्धति है।
फसल विविधीकरण का अर्थ एक ही फसल पर निर्भर रहने के स्थान पर खेत में विभिन्न फसलों अथवा cropping systems को अपनाना है।
इसके अंतर्गत crop rotation, intercropping, mixed cropping और multiple cropping जैसी प्रणालियाँ सम्मिलित हो सकती हैं।
अलग-अलग फसलों की जड़ों की गहराई और पोषक तत्वों की आवश्यकता भिन्न होने से मिट्टी के संसाधनों का अधिक संतुलित उपयोग हो सकता है।
फसल-चक्र कीटों, रोगजनकों और खरपतवारों के लगातार जीवन-चक्र को तोड़ सकता है।
दलहनी फसलों को सम्मिलित करने से मृदा में जैविक नाइट्रोजन की उपलब्धता बढ़ सकती है।
विविधीकरण मिट्टी के जैविक पदार्थ, microbial diversity और संरचना में सुधार कर सकता है।
यह किसी एक फसल की विफलता, बाजार-मूल्य में गिरावट या चरम मौसम से जुड़े आर्थिक जोखिम को कम कर सकता है।
इसलिए फसल विविधीकरण कृषि की पारिस्थितिक और आर्थिक resilience बढ़ाता है।
2. दलहन गहनता—पर्यावरण-अनुकूली कृषि पद्धति है।
दलहन गहनता का अर्थ cropping system में दलहनी फसलों का अनुपात या आवृत्ति बढ़ाना है।
चना, अरहर, मूँग, उड़द, मसूर और मटर जैसी दलहनी फसलें Rhizobium समूह के जीवाणुओं के साथ सहजीविता करती हैं।
जड़-ग्रंथियों में उपस्थित जीवाणु वायुमंडलीय nitrogen का जैविक स्थिरीकरण करते हैं।
इससे synthetic nitrogen fertilisers पर निर्भरता कम हो सकती है।
nitrogen fertiliser का विवेकपूर्ण कम उपयोग उसके निर्माण से संबंधित ऊर्जा-उपभोग और greenhouse-gas emissions को कम करने में सहायता कर सकता है।
दलहनी फसलों की जड़ें और फसल-अवशेष मिट्टी में nitrogen तथा organic matter जोड़ सकते हैं।
कई दलहन अपेक्षाकृत कम पानी में उग सकते हैं और crop rotation में cereal crops को लाभ पहुँचा सकते हैं।
इसलिए दलहन गहनता मृदा-स्वास्थ्य, पोषण-सुरक्षा और sustainable agriculture के लिए उपयोगी है।
3. टेन्सियोमीटर का प्रयोग—पर्यावरण-अनुकूली कृषि पद्धति है।
टेन्सियोमीटर मिट्टी में जल की मात्रा को सीधे नहीं, बल्कि soil-water tension या matric potential को मापता है।
यह बताता है कि पौधों की जड़ों को मिट्टी से पानी प्राप्त करने के लिए कितना बल लगाना पड़ेगा।
इसके आधार पर किसान आवश्यकता के उचित समय पर सिंचाई कर सकता है।
इससे अनुमान के आधार पर होने वाली अत्यधिक अथवा अनावश्यक सिंचाई कम की जा सकती है।
उचित irrigation scheduling जल की बचत करता है और waterlogging की संभावना घटाता है।
यह पोषक तत्वों के जड़-क्षेत्र से नीचे leaching तथा सतही runoff को कम कर सकता है।
टेन्सियोमीटर विशेष रूप से drip irrigation और हल्की से मध्यम बनावट वाली मिट्टियों में उपयोगी होता है।
इसलिए इसका प्रयोग जल-उपयोग दक्षता और मृदा-गुणवत्ता बनाए रखने में सहायता करता है।
4. ऊर्ध्वाधर कृषि—दिए गए संदर्भ में पर्यावरण-अनुकूली कृषि पद्धति नहीं मानी गई है।
ऊर्ध्वाधर कृषि में फसलों को भवनों या नियंत्रित संरचनाओं के भीतर एक-दूसरे के ऊपर कई स्तरों में उगाया जाता है।
इसमें hydroponics, aeroponics, artificial lighting, temperature control और humidity control का उपयोग किया जा सकता है।
यह कम भूमि और नियंत्रित जल-प्रयोग में अधिक उत्पादन दे सकती है।
शहरी क्षेत्रों के निकट उत्पादन से परिवहन दूरी और उससे जुड़े कुछ उत्सर्जन कम किए जा सकते हैं।
परंतु artificial lighting, cooling, heating और ventilation के कारण इसकी ऊर्जा आवश्यकता बहुत अधिक हो सकती है।
यदि यह ऊर्जा जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त हो, तो इसका carbon footprint काफी अधिक हो सकता है।
आवश्यक संरचना और उपकरणों की लागत भी भारत के सामान्य कृषि संदर्भ में इसे सार्वभौमिक पर्यावरण-अनुकूली पद्धति नहीं बनाती है।
इसलिए प्रश्न के संदर्भ में ऊर्ध्वाधर कृषि को सही विकल्प में सम्मिलित नहीं किया गया है।
समग्र निष्कर्ष
फसल विविधीकरण कृषि-जैवविविधता और resilience बढ़ाता है।
दलहन गहनता जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण और मृदा-स्वास्थ्य में सहायता करती है।
टेन्सियोमीटर वैज्ञानिक irrigation scheduling और जल-संरक्षण में सहायता करता है।
ऊर्ध्वाधर कृषि के कुछ लाभ हैं, लेकिन उसकी पर्यावरणीय उपयोगिता प्रयुक्त ऊर्जा के स्रोत और संपूर्ण life-cycle पर निर्भर करती है।
अतः 1, 2 और 3 पर्यावरण-अनुकूली कृषि पद्धतियाँ हैं।