JAGTIV · Previous Year Questions

UPSC

ENVIRONMENT · 2020

Previous Year Question

भारत के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सी पर्यावरण-अनुकूली कृषि की पद्धति/पद्धतियाँ मानी जाती है/हैं?

  1. फसल विविधीकरण

  2. दलहन गहनता

  3. टेन्सियोमीटर का प्रयोग

  4. ऊर्ध्वाधर कृषि

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

A.

1, 2 और 3

B.

केवल 3

C.

केवल 4

D.

1, 2, 3 और 4

Correct Answer: A

Detailed Solution

1. फसल विविधीकरण—पर्यावरण-अनुकूली कृषि पद्धति है।

  • फसल विविधीकरण का अर्थ एक ही फसल पर निर्भर रहने के स्थान पर खेत में विभिन्न फसलों अथवा cropping systems को अपनाना है।

  • इसके अंतर्गत crop rotation, intercropping, mixed cropping और multiple cropping जैसी प्रणालियाँ सम्मिलित हो सकती हैं।

  • अलग-अलग फसलों की जड़ों की गहराई और पोषक तत्वों की आवश्यकता भिन्न होने से मिट्टी के संसाधनों का अधिक संतुलित उपयोग हो सकता है।

  • फसल-चक्र कीटों, रोगजनकों और खरपतवारों के लगातार जीवन-चक्र को तोड़ सकता है।

  • दलहनी फसलों को सम्मिलित करने से मृदा में जैविक नाइट्रोजन की उपलब्धता बढ़ सकती है।

  • विविधीकरण मिट्टी के जैविक पदार्थ, microbial diversity और संरचना में सुधार कर सकता है।

  • यह किसी एक फसल की विफलता, बाजार-मूल्य में गिरावट या चरम मौसम से जुड़े आर्थिक जोखिम को कम कर सकता है।

  • इसलिए फसल विविधीकरण कृषि की पारिस्थितिक और आर्थिक resilience बढ़ाता है।

2. दलहन गहनता—पर्यावरण-अनुकूली कृषि पद्धति है।

  • दलहन गहनता का अर्थ cropping system में दलहनी फसलों का अनुपात या आवृत्ति बढ़ाना है।

  • चना, अरहर, मूँग, उड़द, मसूर और मटर जैसी दलहनी फसलें Rhizobium समूह के जीवाणुओं के साथ सहजीविता करती हैं।

  • जड़-ग्रंथियों में उपस्थित जीवाणु वायुमंडलीय nitrogen का जैविक स्थिरीकरण करते हैं।

  • इससे synthetic nitrogen fertilisers पर निर्भरता कम हो सकती है।

  • nitrogen fertiliser का विवेकपूर्ण कम उपयोग उसके निर्माण से संबंधित ऊर्जा-उपभोग और greenhouse-gas emissions को कम करने में सहायता कर सकता है।

  • दलहनी फसलों की जड़ें और फसल-अवशेष मिट्टी में nitrogen तथा organic matter जोड़ सकते हैं।

  • कई दलहन अपेक्षाकृत कम पानी में उग सकते हैं और crop rotation में cereal crops को लाभ पहुँचा सकते हैं।

  • इसलिए दलहन गहनता मृदा-स्वास्थ्य, पोषण-सुरक्षा और sustainable agriculture के लिए उपयोगी है।

3. टेन्सियोमीटर का प्रयोग—पर्यावरण-अनुकूली कृषि पद्धति है।

  • टेन्सियोमीटर मिट्टी में जल की मात्रा को सीधे नहीं, बल्कि soil-water tension या matric potential को मापता है।

  • यह बताता है कि पौधों की जड़ों को मिट्टी से पानी प्राप्त करने के लिए कितना बल लगाना पड़ेगा।

  • इसके आधार पर किसान आवश्यकता के उचित समय पर सिंचाई कर सकता है।

  • इससे अनुमान के आधार पर होने वाली अत्यधिक अथवा अनावश्यक सिंचाई कम की जा सकती है।

  • उचित irrigation scheduling जल की बचत करता है और waterlogging की संभावना घटाता है।

  • यह पोषक तत्वों के जड़-क्षेत्र से नीचे leaching तथा सतही runoff को कम कर सकता है।

  • टेन्सियोमीटर विशेष रूप से drip irrigation और हल्की से मध्यम बनावट वाली मिट्टियों में उपयोगी होता है।

  • इसलिए इसका प्रयोग जल-उपयोग दक्षता और मृदा-गुणवत्ता बनाए रखने में सहायता करता है।

4. ऊर्ध्वाधर कृषि—दिए गए संदर्भ में पर्यावरण-अनुकूली कृषि पद्धति नहीं मानी गई है।

  • ऊर्ध्वाधर कृषि में फसलों को भवनों या नियंत्रित संरचनाओं के भीतर एक-दूसरे के ऊपर कई स्तरों में उगाया जाता है।

  • इसमें hydroponics, aeroponics, artificial lighting, temperature control और humidity control का उपयोग किया जा सकता है।

  • यह कम भूमि और नियंत्रित जल-प्रयोग में अधिक उत्पादन दे सकती है।

  • शहरी क्षेत्रों के निकट उत्पादन से परिवहन दूरी और उससे जुड़े कुछ उत्सर्जन कम किए जा सकते हैं।

  • परंतु artificial lighting, cooling, heating और ventilation के कारण इसकी ऊर्जा आवश्यकता बहुत अधिक हो सकती है।

  • यदि यह ऊर्जा जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त हो, तो इसका carbon footprint काफी अधिक हो सकता है।

  • आवश्यक संरचना और उपकरणों की लागत भी भारत के सामान्य कृषि संदर्भ में इसे सार्वभौमिक पर्यावरण-अनुकूली पद्धति नहीं बनाती है।

  • इसलिए प्रश्न के संदर्भ में ऊर्ध्वाधर कृषि को सही विकल्प में सम्मिलित नहीं किया गया है।

समग्र निष्कर्ष

  • फसल विविधीकरण कृषि-जैवविविधता और resilience बढ़ाता है।

  • दलहन गहनता जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण और मृदा-स्वास्थ्य में सहायता करती है।

  • टेन्सियोमीटर वैज्ञानिक irrigation scheduling और जल-संरक्षण में सहायता करता है।

  • ऊर्ध्वाधर कृषि के कुछ लाभ हैं, लेकिन उसकी पर्यावरणीय उपयोगिता प्रयुक्त ऊर्जा के स्रोत और संपूर्ण life-cycle पर निर्भर करती है।

अतः 1, 2 और 3 पर्यावरण-अनुकूली कृषि पद्धतियाँ हैं।

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