JAGTIV · Previous Year Questions

UPSC

GEOGRAPHY · 2017

Previous Year Question

निम्नलिखित में से कौन-सी पद्धतियाँ कृषि में जल संरक्षण में सहायक हो सकती हैं?

  1. भूमि की कम या शून्य जुताई

  2. खेत की सिंचाई करने से पूर्व जिप्सम का प्रयोग

  3. फसल अवशेषों को खेत में ही रहने देना

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए :

A.

केवल 1 और 2

B.

केवल 3

C.

केवल 1 और 3

D.

1, 2 और 3

Correct Answer: C

Detailed Solution

कथन 1 सही है: कम या शून्य जुताई में मिट्टी को बार-बार पलटा नहीं जाता। इससे मिट्टी की संरचना एवं रन्ध्रों की निरंतरता अपेक्षाकृत सुरक्षित रहती है। सतह पर मौजूद आवरण के कारण वाष्पीकरण, अपवाह और मृदा अपरदन कम होता है तथा जल का अंतःस्रवण और मृदा में नमी का संरक्षण बढ़ता है। शून्य जुताई से खेत तैयार करने में होने वाले बार-बार के यांत्रिक कार्य भी कम होते हैं।

कथन 2 सही नहीं है: जिप्सम कैल्सियम सल्फेट है, जिसका प्रयोग मुख्यतः सोडिक अथवा क्षारीय मृदाओं के सुधारक के रूप में किया जाता है। इससे प्राप्त कैल्सियम, मृदा के विनिमय-स्थलों से सोडियम को विस्थापित करता है। इससे मृदा की संरचना और पारगम्यता में सुधार होता है तथा सोडियम को नीचे निकाला जा सकता है। सोडिक मृदा में यह जल के अंतःस्रवण को सुधार सकता है, लेकिन सिंचाई से पहले जिप्सम का प्रयोग करना कृषि में जल संरक्षण की कोई सामान्य पद्धति नहीं है। यह विशेष प्रकार की समस्याग्रस्त मृदा के सुधार की पद्धति है।

कथन 3 सही है: फसल अवशेषों को खेत में छोड़ने से वे मल्च की तरह कार्य करते हैं। यह वर्षा की बूंदों के सीधे प्रभाव, सतही पपड़ी, जल के अपवाह और मृदा अपरदन को कम करता है। अवशेषों का आवरण वाष्पीकरण घटाता है, मृदा के तापमान को नियंत्रित करता है तथा अंतःस्रवण और संरक्षित मृदा-नमी को बढ़ाता है। लंबे समय में इससे मृदा के कार्बनिक पदार्थ में भी वृद्धि हो सकती है।

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