JAGTIV · Previous Year Questions

UPSC

GEOGRAPHY · 2010

Previous Year Question

मृदा संरक्षण के संदर्भ में निम्नलिखित प्रचलित पद्धतियों पर विचार कीजिए-

  1. शस्यावर्तन (फसलों का हेरफेर)

  2. बालू की बाड़

  3. वेदिका निर्माण (टैरेसिंग)

  4. वायुरोध

भारत में मृदा संरक्षण के लिए उपर्युक्त में से कौन-सी विधियां उपयुक्त समझी जाती हैं?

A.

केवल 1, 2 और 3

B.

केवल 2 और 4

C.

केवल 1, 3 और 4

D.

1, 2, 3, और 4

Correct Answer: D

Detailed Solution

चारों पद्धतियाँ जल अथवा वायु द्वारा होने वाले मृदा अपरदन को नियंत्रित करने में सहायक हैं।

1. शस्यावर्तन—उपयुक्त

शस्यावर्तन में एक ही खेत में निश्चित क्रम से अलग-अलग फसलें उगाई जाती हैं। इसके लाभ हैं—

  • अलग गहराई वाली जड़ें मृदा की विभिन्न परतों का उपयोग करती हैं;

  • दलहनी फसलें Rhizobium जीवाणुओं की सहायता से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती हैं;

  • मृदा में कार्बनिक पदार्थ और संरचना में सुधार होता है;

  • भूमि लंबे समय तक वनस्पति से ढकी रहने के कारण वर्षा-बूँदों का प्रत्यक्ष आघात कम होता है;

  • कीट, रोग और खरपतवार के जीवन-चक्र टूटते हैं;

  • सतही जल-प्रवाह तथा मृदा-कणों का बहाव कम होता है।

अतः शस्यावर्तन मृदा की उर्वरता बनाए रखने के साथ अपरदन भी घटाता है।

2. बालू की बाड़—उपयुक्त

बालू की बाड़ लकड़ी, झाड़ियों, सरकंडों, जाल अथवा अन्य छिद्रयुक्त सामग्री से बनाई जाने वाली कम ऊँचाई की अवरोधक संरचना है। इसे सामान्यतः प्रचलित पवन-दिशा के अनुप्रस्थ लगाया जाता है।

यह भूमि-सतह के पास पवन की गति कम करके उड़ती हुई बालू को बाड़ के आसपास जमा करती है। इससे—

  • बालू के टीलों की गति नियंत्रित होती है;

  • कृषि भूमि, सड़क और नहरों पर बालू का जमाव कम होता है;

  • पौधरोपण के लिए अपेक्षाकृत स्थिर सतह तैयार होती है।

यह शुष्क, मरुस्थलीय, अर्द्ध-मरुस्थलीय और बलुई तटीय क्षेत्रों में उपयोगी है। दीर्घकालीन स्थिरीकरण के लिए बालू की बाड़ के साथ घास और झाड़ियों का रोपण भी किया जाता है।

3. वेदिका निर्माण—उपयुक्त

वेदिका निर्माण में पहाड़ी ढाल को सीढ़ीनुमा समतल अथवा लगभग समतल खेतों में बदल दिया जाता है। इससे—

  • ढाल की लंबाई और तीव्रता कम होती है;

  • सतही जल-प्रवाह की गति घटती है;

  • जल का अंतःस्रवण बढ़ता है;

  • बहकर आए मृदा-कण वेदिकाओं पर जमा होते हैं;

  • परत, नाली और अवनालिका अपरदन नियंत्रित होता है।

इसका प्रयोग विशेष रूप से हिमालय तथा अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में किया जाता है। वेदिकाओं की उचित जल-निकासी और नियमित रखरखाव आवश्यक है।

4. वायुरोध—उपयुक्त

वायुरोध खेतों के किनारों पर प्रचलित पवन-दिशा के लगभग समकोण पर लगाई गई वृक्षों और झाड़ियों की पंक्तियाँ हैं। इन्हें पवन-अवरोध अथवा आश्रय-पट्टी भी कहा जाता है।

ये—

  • भूमि-सतह के पास पवन की गति घटाते हैं;

  • उपजाऊ ऊपरी मृदा को उड़ने से रोकते हैं;

  • फसलों को तेज हवा से होने वाली क्षति से बचाते हैं;

  • वाष्पीकरण और नमी की हानि घटाते हैं;

  • मरुस्थलीय क्षेत्रों में बालू के टीलों को स्थिर करने में सहायता करते हैं।

महत्त्वपूर्ण परीक्षा-बिंदु

विकल्प (c) में शस्यावर्तन, वेदिका निर्माण और वायुरोध शामिल हैं, लेकिन उसमें बालू की बाड़ छोड़ दी गई है। बालू की बाड़ भी वायु अपरदन और बालू के संचलन को नियंत्रित करने की स्वीकृत पद्धति है। इसलिए सही उत्तर सभी चार पद्धतियाँ हैं।

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