Previous Year Question
निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए :
परम्पराएँ | समुदाय |
1. चलिहा साहिब उत्सव | सिंधियों का |
2. नन्दा राज जात यात्रा | गोंडों का |
3. वारी-वारकरी | संथालों का |
ऊपर दिए गए युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
Correct Answer: A
Detailed Solution
युग्म 1—चलिहा साहिब उत्सव : सिंधियों का—सही है।
चलिहा साहिब सिंधी हिन्दू समुदाय की एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक परम्परा है।
इसमें भगवान झूलेलाल की आराधना करते हुए सामान्यतः 40 दिनों का व्रत और संयम रखा जाता है। ‘चलिहा’ शब्द भी चालीस दिनों की अवधि की ओर संकेत करता है।
श्रद्धालु सात्त्विक भोजन, प्रार्थना और आत्मसंयम का पालन करते हैं। जलाशय के पास प्रार्थना करते हुए चावल, चीनी, इलायची और हल्दी आदि से बना ‘अखो’ अर्पित करने की परम्परा भी मिलती है।
चालीस दिनों की अवधि पूरी होने पर मटकी मेला और सामूहिक प्रार्थना जैसे अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
झूलेलाल सिंधी समुदाय के आराध्य देव माने जाते हैं और उनका जल से विशेष संबंध है। इसलिए यह युग्म सही है।
युग्म 2—नन्दा राज जात यात्रा : गोंडों का—गलत है।
नन्दा देवी राज जात उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्रों से संबंधित धार्मिक एवं सांस्कृतिक यात्रा है; यह गोंड समुदाय की परम्परा नहीं है।
चमोली क्षेत्र में इसका प्रमुख आयोजन लगभग 12 वर्ष के अंतराल पर किया जाता है और यात्रा लगभग तीन सप्ताह तक चलती है।
यात्रा नन्दप्रयाग-कर्णप्रयाग क्षेत्र के निकट स्थित नौटी गाँव से आरम्भ होकर रूपकुंड तथा होमकुंड की ऊँचाइयों की ओर जाती है।
यात्रा में चार सींगों वाला मेढ़ा—स्थानीय रूप से ‘चौसिंगा खाडू’—विशेष धार्मिक महत्त्व रखता है।
नन्दा देवी को स्थानीय परम्परा में हिमालय की बेटी माना जाता है। यात्रा में देवी को उनके मायके से विदा करके कैलाश स्थित ससुराल भेजने का भाव निहित है।
गोंड मुख्यतः मध्य भारत का एक प्रमुख जनजातीय समुदाय है; इसलिए नन्दा देवी राज जात को गोंडों से जोड़ना सही नहीं है।
युग्म 3—वारी-वारकरी : संथालों का—गलत है।
वारी महाराष्ट्र की भक्ति-परम्परा है, जिसका प्रमुख केन्द्र पंढरपुर का भगवान विठोबा अथवा पांडुरंग मंदिर है।
‘वारी’ का अर्थ नियमित रूप से की जाने वाली तीर्थयात्रा है, जबकि इस यात्रा और भक्ति-परम्परा का पालन करने वाले श्रद्धालु ‘वारकरी’ कहलाते हैं।
आषाढ़ी एकादशी की वारी सर्वाधिक प्रसिद्ध है। देहू से संत तुकाराम और आलंदी से संत ज्ञानेश्वर की पादुकाओं वाली पालकियाँ पंढरपुर जाती हैं।
श्रद्धालुओं के संगठित समूह ‘दिंडी’ कहलाते हैं। यात्रा के दौरान अभंग, भजन और कीर्तन गाए जाते हैं।
वारकरी परम्परा संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम जैसे महाराष्ट्र के भक्ति संतों से संबंधित है।