Previous Year Question
मध्यकालीन भारत के सांस्कृतिक इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
तमिल क्षेत्र के सिद्ध (सित्तर) एकेश्वरवादी थे तथा मूर्तिपूजा की निंदा करते थे।
कन्नड़ क्षेत्र के लिंगायत पुनर्जन्म के सिद्धांत पर प्रश्न चिह्न लगाते थे तथा जाति अधिक्रम को अस्वीकार करते थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Correct Answer: C
Detailed Solution
कथन 1 सही है। तमिल क्षेत्र के सिद्ध अथवा सित्तर एक रहस्यवादी धार्मिक परंपरा से संबंधित थे। वे बाहरी धार्मिक कर्मकांडों की अपेक्षा व्यक्ति के भीतर परम सत्ता की अनुभूति पर बल देते थे। सिद्ध परंपरा में परम सत्य को एक माना गया और मूर्ति-पूजा, कर्मकांड तथा बाहरी धार्मिक आडंबरों की आलोचना की गई।
यह विचार केवल आधुनिक व्याख्या से नहीं आता। सिद्धर काव्य स्वयं इसका महत्त्वपूर्ण आंतरिक साहित्यिक प्रमाण है। विशेष रूप से शिववाक्कियार (Sivavakkiyar) से संबद्ध पदों में मंदिर-केंद्रित कर्मकांड, मूर्ति-पूजा और जातिगत भेदों की तीखी आलोचना मिलती है। सिद्धर साहित्य के अलग-अलग ग्रंथों और कवियों की निश्चित तिथि पर विद्वानों में मतभेद है, इसलिए किसी एक पद को बिना सावधानी के किसी निश्चित शताब्दी का समकालीन प्रमाण नहीं मानना चाहिए; फिर भी सिद्धर काव्य-परंपरा उनके anti-ritual और anti-idolatry दृष्टिकोण का मूल साहित्यिक आधार है।
कथन 2 भी सही है। 12वीं शताब्दी में कर्नाटक में बसवन्ना के नेतृत्व में वीरशैव/लिंगायत आंदोलन का विकास हुआ। उनके अनुयायी वीरशैव अथवा लिंगायत कहलाए। वे शिव को लिंग के रूप में पूजते थे, लेकिन ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था में विद्यमान जाति और ‘अशुद्धता’ की अवधारणा को चुनौती देते थे। उन्होंने पुनर्जन्म के सिद्धांत पर भी प्रश्न उठाया।
लिंगायत विश्वास के अनुसार मृत्यु के बाद भक्त शिव के साथ एकाकार हो जाता है और इस संसार में पुनः जन्म नहीं लेता। इसी कारण वे धर्मशास्त्रीय परंपरा में निर्धारित दाह-संस्कार के स्थान पर अपने मृतकों को विधिपूर्वक दफनाते थे।