Previous Year Question
कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार, निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
न्यायिक दंड के परिणामस्वरूप कोई व्यक्ति दास बन सकता था।
यदि कोई दासी अपने स्वामी से पुत्र उत्पन्न करती थी, तो वह कानूनी रूप से स्वतंत्र थी।
यदि किसी दासी से उत्पन्न पुत्र का पिता उसका स्वामी था, तो वह पुत्र स्वामी के पुत्र का कानूनी दर्जा प्राप्त करने का हकदार था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
Correct Answer: D
Detailed Solution
कथन 1 सही है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के तृतीय अधिकरण, अध्याय 13 में दासों और कर्मकारों से संबंधित नियम दिए गए हैं। मूल संस्कृत पाठ में “दण्डप्रणीतः” (daṇḍa-praṇītaḥ) का उल्लेख है और कहा गया है कि ऐसा व्यक्ति श्रम द्वारा दंड की राशि चुका सकता था। पुराने मानक अनुवाद में इसे ऐसे व्यक्ति के रूप में समझाया गया है जो fine अथवा court decree के कारण servitude में आया हो। इसलिए न्यायिक दंड के कारण दासत्व/बंधुआ सेवा की स्थिति उत्पन्न हो सकती थी।
कथन 2 सही है। अर्थशास्त्र 3.13.23 का मूल संस्कृत पाठ है—“स्वामिनः स्वस्यां दास्यां जातं समातृकम् अदासं विद्यात्”। इसका आशय है कि यदि स्वामी से उसकी दासी को संतान उत्पन्न होती है, तो संतान और उसकी माता दोनों को दास नहीं माना जाएगा, अर्थात दोनों स्वतंत्र माने जाएँगे।
कथन 3 भी सही है। ऐसी संतान को सामान्य दास की स्थिति में नहीं रखा जाता था; स्वामी द्वारा उत्पन्न पुत्र को उसके पितृत्व के आधार पर स्वामी के परिवार में कानूनी मान्यता प्राप्त होती थी। यही इस कथन में “legal status of the master's son” से अभिप्रेत है। दास-माता और स्वामी की संतान की स्वतंत्र स्थिति का मूल आधार अर्थशास्त्र 3.13.23 में मिलता है।
एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि कौटिल्य की व्यवस्था में दास की स्थिति पूर्णतः अपरिवर्तनीय नहीं थी। मूल्य चुकाकर स्वतंत्रता प्राप्त करने, गर्भवती दासी को बिना उचित व्यवस्था बेचे या गिरवी रखे जाने पर दंड और मुक्त किए गए दास को पुनः बेचने पर दंड जैसे प्रावधान भी उसी अध्याय में मिलते हैं।