Previous Year Question
भारत के धार्मिक इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
सौत्रान्तिक और सम्मितीय जैन धर्म के संप्रदाय थे।
सर्वास्तिवादी मानते थे कि घटनाओं/धर्मों के घटक पूर्णतः क्षणिक नहीं थे, बल्कि एक अव्यक्त रूप में सदैव विद्यमान रहते थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Correct Answer: B
Detailed Solution
कथन 1 गलत है। सौत्रान्तिक और सम्मितीय जैन नहीं बल्कि बौद्ध परंपराओं से संबंधित संप्रदाय थे। सौत्रान्तिक प्रारंभिक बौद्ध दार्शनिक परंपरा थी, जिसने सूत्रों को विशेष महत्व दिया।
सम्मितीय (Saṃmitīya) भी बौद्ध संप्रदाय था। इसका संबंध उस बौद्ध परंपरा से था जिसमें पुद्गल (person) की स्थिति पर विशेष दार्शनिक चर्चा विकसित हुई। Digital Sanskrit Buddhist Canon में संरक्षित एक मूल बौद्ध दार्शनिक पाठ में सीधे “saṃmitīyā vadanti” — “सम्मितीय ऐसा कहते हैं” कहते हुए उनकी pudgala संबंधी स्थिति की चर्चा मिलती है। अतः दोनों को जैन संप्रदाय कहना गलत है।
कथन 2 सही है। सर्वास्तिवाद का नाम ही उसके प्रमुख सिद्धांत “सर्वम् अस्ति” — “सब विद्यमान है” से जुड़ा है। सर्वास्तिवादी-वैभाषिक परंपरा में धर्मों की सत्ता को केवल वर्तमान क्षण तक सीमित नहीं माना गया, बल्कि अतीत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालों में धर्मों की किसी न किसी अर्थ में वास्तविक सत्ता स्वीकार की गई। Abhidharmakośabhāṣya में अतीत, अनागत और वर्तमान धर्मों के संदर्भ में इस त्रिकालिक व्यवस्था की स्पष्ट चर्चा मिलती है।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण UPSC-level nuance है। कथन में प्रयुक्त “existed forever in a latent form” सर्वास्तिवाद के सिद्धांत को सरल भाषा में व्यक्त करता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि संसार की वस्तुएँ बिना परिवर्तन के अनन्त काल तक बनी रहती हैं। बौद्ध दर्शन अनित्यता को स्वीकार करता है। सर्वास्तिवाद की विशिष्टता यह थी कि धर्मों की तीनों कालों में ontological existence स्वीकार की गई, जबकि उनकी वर्तमान क्रियाशीलता और temporal mode अलग समझे जाते थे।