Previous Year Question
“आत्माएँ केवल पशु और वनस्पति जीवन में ही नहीं, बल्कि चट्टानों, बहते हुए जल तथा अनेक अन्य प्राकृतिक वस्तुओं में भी होती हैं, जिन्हें अन्य धार्मिक संप्रदाय जीवित नहीं मानते।”
उपर्युक्त कथन प्राचीन भारत के निम्नलिखित में से किस धार्मिक संप्रदाय की एक मूल मान्यता को दर्शाता है?
Correct Answer: B
Detailed Solution
यह कथन जैन धर्म की जीव (Jīva) संबंधी अवधारणा को दर्शाता है। NCERT के अनुसार जैन दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विचार यह है कि पूरा संसार animate है; यहाँ तक कि पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना जाता है। इसी व्यापक जीव-दृष्टि के कारण अहिंसा जैन दर्शन का केंद्रीय सिद्धांत बनती है।
इसे और गहराई से समझने के लिए जीव (Jīva) और अजीव (Ajīva) का अंतर महत्वपूर्ण है। जैन दर्शन वास्तविकता को जीव और अजैविक द्रव्यों के आधार पर विश्लेषित करता है। जीव चेतन तत्व है, जबकि अजीव में पुद्गल आदि गैर-चेतन द्रव्य आते हैं। इसलिए प्रश्न का आशय यह नहीं है कि जैन दर्शन में हर पत्थर का पदार्थ स्वयं चेतन substance है; बल्कि विशेष प्रकार के जीव earth-bodied, water-bodied आदि शरीरों में अस्तित्व रखते हैं।
इसकी प्रत्यक्ष doctrinal पुष्टि तत्त्वार्थसूत्र 2.13 में मिलती है। इसमें पाँच प्रकार के स्थावर अथवा एकेंद्रिय जीव बताए गए हैं:
पृथ्वीकायिक — earth-bodied
जलकायिक — water-bodied
अग्निकायिक — fire-bodied
वायुकायिक — air-bodied
वनस्पतिकायिक — plant-bodied
इन स्थावर जीवों को एकेंद्रिय माना गया है, अर्थात इनमें केवल स्पर्श की इन्द्रिय होती है। तत्त्वार्थसूत्र 2.22 की व्याख्या पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति-कायिक जीवों को इसी एकेंद्रिय वर्ग में रखती है।
यही worldview जैन अहिंसा की अत्यधिक व्यापकता को समझाता है। क्योंकि जीवन केवल मनुष्य और पशु तक सीमित नहीं माना गया, इसलिए जीव को हानि पहुँचाने से बचने की नैतिक मांग भी बहुत व्यापक हुई। NCERT के अनुसार जैन दर्शन में मनुष्य, पशु, पौधे और कीट सहित जीवों को चोट न पहुँचाना केंद्रीय सिद्धांत है और कर्म से मुक्ति के लिए कठोर आत्म-संयम एवं तपस्या पर बल दिया गया।